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बुधवार, 21 मार्च 2018

प्रभु राखें भक्तन की लाज


" चंद लमहे सुकून से, गुज़ार लूं तो चलूँ
ऐ मुहब्बत तुझे दिल से, पुकार लूं तो चलूँ "

अवध की संस्कृति को अपने साहित्यसृजन का केन्द्रीय विषय बनाने वाले "डॉ.योगेश प्रवीन" का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है.


डॉ.साहब की एक पुस्तक है "आपका लखनऊ" इसके नामकरण का राज उन्हीं के शब्दों में :- "जिस सुहानी धूपछाँव का नाम 'लखनऊ' है उसके प्यार का पैगाम आप सबके नाम है, इसलिए लखनऊ पहले हमारा नहीं है हमसे पहले आप का है - "आपका लखनऊ"

अपनी 250 से अधिक पृष्ठों में व्याप्त इस पुस्तक में लखनऊ के इतिहास से लेकर वर्तमान तक को समेटा गया है. क्या कला, क्या हस्तशिल्प, क्या गीत-संगीत, क्या पकवान और क्या तहजीब ; ऐसा कोई लखनवी पहलू नहीं जो इस किताब में समाहित ना हो.



इसी ग्रँथ में " यह आकाशवाणी लखनऊ है" नामक अध्याय भी है जिसमें लेखक ने रेडियो और लखनऊ आकाशवाणी केंद्र की महत्ता को रेखांकित किया है, इस अंदाजे-बयाँ पर गौर कीजियेगा जरा :-

" इस तरह जब लखनऊ आकाशवाणी का जन्म हुआ तो शहीदाने वतन अपने वतन पर निसार हो रहे थे. 02 अप्रैल 1938 की शाम पं. गोबिंदबल्लभ पन्त जी के हाथों लखनऊ रेडियो स्टेशन का उद्घाटन हुआ था और उस समय जो पहला गीत यहाँ से प्रसारित हुआ था, वह था..."प्रभु राखें भक्तन की लाज"

इस पुस्तक के प्रकाशक "लखनऊ महोत्सव पत्रिका समिति, लखनऊ" हैं, पहला संस्करण जो कि मैंने पढ़ा वर्ष 2002 में प्रकाशित हुआ था. लेख के शीर्षक में दिया हुआ कलाम डॉ.योगेश प्रवीन का है.


रविवार, 11 मार्च 2018

हरियाला रेडियो


रंगों के त्यौहार पर कुछ रंगीन होना ही चहिये तो यह हरा-भरा रेडियो ( Tivdio Radio HR 11S )खरीदा है. कुछ छोटी-मोटी बातें इस छोटू-मोटू के बारे में :-

1. यह तीन बैंड ( MW,SW(1-12)और FM) वर्ल्ड रिसीवर रेडियो है, तीनों बैंड की फ्रीक्वेंसी रेंज इस प्रकार है -
*MW - 522 से 1710 Khz
*SW - 3.0 से 23.0 Mhz
*FM - 64.0 से 108 Mhz
DSP चिप होने से सिग्नल पकड़ने की अच्छी गुणवत्ता है. डिजिटल डिस्प्ले है.


2.MP3 प्लेयर ( 32 GBमेमोरी कार्ड सपोर्ट ). ब्लूटूथ है जिससे आप गाने भी सुन सकते हैं और फोन कॉल का जवाब भी दे सकते हैं.
3. ऑटोमैटिक ट्यूनिंग और ऑटोमैटिक / मैन्युअल रेडियो स्टेशन सुरक्षित कर सकते हैं.
4. रेडियो / माइक/ लाइन-इन रिकॉर्डिंग.


निर्माता इसे आपातकालीन रेडियो कहते हैं तो इसके पीछे यह फीचर्स हैं -

5. इसमें रिचार्जेबल बैटरी है जिसे आप मोबाइल चार्जर से या धूप में इसी में लगे हुए सौर सेल से चार्ज कर सकते हैं, थोड़ी सी कसरत करने का मन हो तो हैंड क्रेंक घुमा-घुमा के भी इसे चार्ज किया जा सकता है.
6.बाजू में एक टार्च भी है. संकेत देने के लिए एक लाल संकेतक भी है और एक अलर्ट सायरन भी है.
7. मोबाइल फोन भी रेडियो की बैटरी या सोलर सेल या हैंडक्रेंक से चार्ज किया जा सकता है.
8. घड़ी, कैलेंडर, अलार्म और टाइमर तो खैर हैं ही.
 तब तक हम जरा देखते हैं कि कौन सा स्टेशन अभी क्या प्रसारित कर रहा है !!


बुधवार, 24 मई 2017

किरकिचयाऊ


बुंदेली बोली में कहासुनी, तकरार को "किरकिच" कहा जाता है. छायाचित्र में यह जो लाल-नारंगी-पीले फूलों वाली वनस्पति आप देख रहे हैं उसे ही हमारे यहाँ "किरकिचयाऊ" कहते हैं यानि "झगड़ा कराने वाली". कहा जाता है कि इसे जिस घर में डाल दिया जाये उस घर में विवाद हो जाता है.




यह कुछ अतिश्योक्तिपूर्ण कथन है.हालाँकि जिज्ञासावश इसका कारण जानने पर पाया कि इसमें आंशिक सत्यता हो सकती है. जो निष्कर्ष हमने निकाला वह यह है कि यह पौधा पूरा विषाक्त होता है और कुछ यूँ हुआ होगा कि कभी घर में किसी ने इसके फूलों की सुंदरता के कारण सजावट हेतु रखा होगा और किसी बच्चे ने इसे खाने वाली चीज समझ कर खा लिया होगा.बच्चे की तबीयत बिगड़ने का जिम्मेदार इसे लाने वाले को समझकर परिवार के सदस्यों में तू-तू मैं-मैं हो गई होगी ( सम्भवतः जेठानी-देवरानी में ) मतलब कि "किरकिच" हो गई होगी और इस पादप का यह दिलचस्प नामकरण हो गया.


वैसे इसका नाम हिंदी में "कलिहारी", अंग्रेजी में "फायर लिली" , वैज्ञानिक "ग्लोरियोसा सुपर्बा" है. यह एक आयुर्वेदिक औषधि है. खेत की मेड पर लगा हुआ पाया गया.

छायाचित्र: डॉ.अमित कुमार नेमा 








सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

एक आँखो देखी त्रासना 498अ की



 किसी कारणवश अदालत जाना हुआ और वहाँ एक झकझोर देने वाला दृश्य देखा। हम कोर्टरूम के बाहर बनी हुई पत्थर की बेंच पर बैठे हुए थे। बाजू वाली बेंच पर एक सजी-सँवरी विवाहित युवती बैठी हुई थी, जो अपने साथ के एक दम्पत्ति से बहुत प्रसन्नता से बात कर रही थी। जिन्हें वह भैया-भाभी पुकार रही थी।

इसी समय न्यायालय परिसर के मुख्यद्वार से पुलिस के साथ एक पुरुष, एक अधेड़ महिला-पुरुष और व्हीलचेयर पर एक अतिवृद्ध महिला को आते देखा, अकारण ही मेरी निगाह बाजू वाली बेंच पर घूमी तो पाया कि ननद और भैया-भाभी, आगंतुकों को आग्नेय नेत्रों से घूर रहे थे।




पुलिस इन्हें लेकर कोर्ट में चली गई, चूँकि हमारी बेंच दरवाजे सामने ही थी तो हमने देखा कि इन सबको पुलिस ने आरोपियों वाले कटघरे में खड़ा कर दिया अब हमारा ध्यान सबसे ज्यादा उस अतिवृद्धा ने आकर्षित किया, वो दादी अम्मा करीब 80-85 की उम्र की थीं, आँखों पर चश्मा और इतनी असहाय कि वो अपने मुँह से बहने वाली लार को भी नहीं पोंछ पा रही थीं। जो उनके कपड़ों को भिगो रही थी।

तभी चपरासी ने एक महिला नाम की पुकार लगाई और सजी-सँवरी विवाहित युवती जो अभी तक अपनी हँसी से पूरा गलियारा गुलज़ार किये हुए थी, अपनी आँखों पर रूमाल रख के उठी, कोर्ट के दरवाज़े तक पहुँचते-पहुँचते तो वो बाकायदा सुबकने भी लगी थी।

भैया का तो पता नहीं पर भाभी जरुर हमें, अपनी ननद की दहेज प्रताड़ना से शिक्षा प्राप्त करती हुई दिखी। कब्र में पाँव लटकाए वह बुजुर्ग महिला जरुर ही भयंकर राक्षसी होगी..........

छायाचित्र : साभार www.abc.net.au


रविवार, 27 सितंबर 2015

माहुलिया के दो दो फूल, छिटक मोरी माहुलिया


ज बचपन कितना सीमित हो गया है। इस सीमित बचपन में भी कितनी कृत्रिमता भर गई है। एक समय था जब बचपन प्रकृति के निकट था, सुखमय था। हम भी गवाह रहे हैं ऐसे बचपन के जब बच्चों को हरफनमौला नहीं बल्कि बच्चा ही समझा जाता था।

हमारे बुंदेलखंड में भादों-क्वार ( भाद्रपद-आश्विन ) के महीनों में छोटी-छोटी लडकियाँ माहुलिया ( मामुलिया ) का खेल रचा करती थीं। इस खेल को खेलने ना कोई महंगे खिलौने चाहिए होते हैं और ना कोई तामझाम। बस एक देशी बेरी की कँटीली झाड़ी ली जाती थी । उसके काँटों पर बरसात में होने वाले फूल सजाये जाते थे। इसमें निहित संदेश कितना महत्वपूर्ण है कि यह संसार कंटकमय है, इन काँटों पर अपनी मुस्कुराहटों, अपने जीवट के पुष्प सजा कर इसे रंगीन,कोमल और शोभनीय बना दो।




खेल तो लड़कियों का होता था, पर हम जैसे दीदियों के छोटे भाई भी साथ में चले जाया करते थे। सुंदर फूलों से सजी उस कंटीली टहनी को लिपे-पुते स्थान पर लगाया जाता था। उसे चुनरी उड़ाई जाती थी सब कन्यायें उसे हल्दी-सिंदूर लगाती थी, चूड़ी-कंगन पहना कर उसका श्रृंगार करती थीं और फिर गाँव-बस्ती में उसकी फेरी लगाकर, बहुत भरे मन से उसका विसर्जन नदी में किया जाता था। माहुलिया को सिराते समय लडकियाँ गाती थीं :-

जरै ई छाबी तला कौ पानी रे
मोरी माहुलिया उजर गई।’’

इन पंक्तियों में भारतीय वेदान्त का सार तत्व निहित है। जीवन जल के समान है जिसमें नहाकर माहुलिया रूपी आत्मा और अधिक निखर उठती है। फिर घाट पर सब लडकियाँ ककड़ी और चना-चबैना खाते हुए गाती थीं :-

"माहुलिया के आ गये लिवौआ, 
झमक चली अरी ढूडक चली मोरी माहुलिया"

इस जीवन का तभी तक श्रृंगार होता है, जब तक कि उसके लिबौआ (विदा कराने वाले) ना आ जाएँ । यह सब एक सलोने सपने जैसा बीत गया !! अब क्यों नहीं आते ऐसे खूबसूरत ख़्वाब ?

चित्र साभार  : www.bundelkhandnews.com


शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

वांछित-अवांछित

पिछले कुछ सालों से हमारे क्षेत्र की खरीफ की मुख्य फसल "सोयाबीन" लगातार किसी ना किसी आपदा से ग्रसित होती आ रही है। इस बार फसल अच्छी है तो येलो मोज़ेक वायरस का प्रकोप शुरू हो गया। एकबार पौधे के इससे ग्रसित हो जाने पर इसका कोई सटीक उपचार नहीं है।  आप बस इसे फ़ैलाने वाले कीटों पर ही नियन्त्रण कर सकते हैं। रोगग्रसित पौधे पुन: स्वस्थ नहीं होते। इसी के चलते हमने खेतों का व्यापक निरीक्षण किया और इससे मिलता-जुलता सबक जिंदगी के लिए भी सीखा। वही यहाँ दोहराना चाहता हूँ।

 " उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं।।
 सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू।।
(रामचरितमानस बाल. 4.3)

खेतों में कितनी लगन-मेहनत के साथ फसल लगाई जाती है। समय-समय पर उसकी देखभाल की जाती है। उसमें खाद-उर्वरक, दवाईयाँ डाली जाती हैं। यही सब हम भी अपने जीवन के साथ करते हैं। जीवन की बढ़िया साज-सम्हाल, सुख-सुविधाओं के लिए प्रयत्न करते हैं। जैसे अच्छा फसलोत्पादन वैसे ही एक उत्तम जीवन भी हमारे लिए वांछित होता है। इतनी एहतियात बरतने के बाद भी दोनों के सामने पचास तरह की आफतें आती हैं।  


येलो मोजेक वायरस से ग्रस्त सोयाबीन की पत्तियाँ 


वहीं दूसरी तरफ नींदा (खरपतवार) होते हैं। यह पूर्णत: अवांछनीय हैं; फिर भी बिना किसी देखभाल के सदा लहराते रहते हैं। ना तो इनको कोई कीट-व्याधि होती है और ना इनमें कोई रोग लगता है। हमारे संसार-समाज में भी ऐसी बहुत सी अनचाही चीजें हैं। फिर वो चाहे बुरे लोग हों, व्यसन हों, कुरीतियाँ हों, या अपराध हों; यह दोनों ही दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ते हैं।    

" पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं।।
बंदऊँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा।।"
(रामचरितमानस बाल.  3ख.4)


आपके हृदय में विराजमान सीतारामजी को, हमारे सीतारामजी की, जयसीतारामजी की पहुँचे। 

  

गुरुवार, 11 जून 2015

इमली का वार

मारे घर के पास एक चौक है, जहाँ अक्सर खेल-तमाशे दिखाने वाले अपने करतब दिखाते हैं। आजकल तो किसी के पास यह सब देखने की फुरसत ही नहीं पर एक समय हुआ करता था जब यह मनोरंजन का प्रधान साधन थे और खेल-तमाशा दिखाने वाले की प्रतिभा को दिल खोल कर तारीफों और अन्य तरीकों से पुरुस्कृत किया जाता था। कई बार तो ऐसा भी होता था कि एक मदारी खेल दिखा रहा हो और दूसरा उस जगह पर कब्जा लेने को प्रतीक्षा में खड़ा दिखता था ।



इतवार का दिन तो जैसे इसके लिए आरक्षित था। तब हम हाफ पैन्ट पहनने वाले, सुडकती नाक को आस्तीन से पोंछने वाले बच्चे थे। खेल-तमाशा दिखाने वाले जनसमूह को आकर्षित/आमंत्रित करने के लिए बीन या मुंह से बजने वाला कोई वाद्य  बजाया करते थे; तो हमारा भी मोहित हो जाना स्वाभाविक था। पर हम यार-दोस्त वहाँ जाने से पहले एक इमली जेब में रखना नहीं भूलते थे।


अब जैसे ही बाजीगर बीन बजाता हम सब छुप-छुप के उसके सामने इमली लहराने लगते। इमली देखकर उसके मुंह में पानी भर आता और बीन के सुर आड़े-टेढ़े निकलने लगते, फिर मदारी बीन बजाना बंद करके पहले हम लोगों को खदेड़ा करता था; और अगर कोई अगला बाजीगर कतार में हुआ तो वह बीन बजाने से पहले सावधान निगाहों से हमें खोज लिया करता था। हमारा तमाशा तो इतने में ही हो जाता था। यह बात और है कि इमली का वार कभी खाली नहीं गया......

अब अपने अमित को आज्ञा दीजिये, कृपया मेरे प्रणाम स्वीकार करें । 

छायाचित्र साभार : विकीपीडिया 


मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

नदियाँ गाती हैं....

    आज फेसबुक पर एक समूह में किसी ने प्रश्न किया कि " निर्माल्य को कैसे विसर्जित करूँ , जल में प्रवाहित करूँ या गड्ढा खोद कर दबा दूँ ? " उनकी इस पोस्ट पर मैंने अपने विचार टिप्पणियों के रूप में व्यक्त किये , जो कि यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ :

      निर्माल्य पर थोड़ा सा गंगाजल छिडकिये और उसे किसी साफ़ जगह ( खेत आदि ) में गड्ढा खोद कर दबा दीजिये ! आजकल बड़े-बड़े प्रसिद्ध मंदिरों में भी निर्माल्य से खाद बनाई जा रही है, इसमें कुछ भी गलत नहीं है बल्कि दो फायदे हैं ( 1 ) . जलस्त्रोत प्रदूषण से बचेंगे ( 2 ) पवित्र और प्राकृतिक खाद प्राप्त होगी |

      मैं आपको अपना एक अनुभव बताता हूँ , मैंने एक-दो बार एक सार्वजनिक दुर्गोत्सव में पूजन किया है, नवमी के दिन हवन के पश्चात स्थापित प्रतिमा का पूजन कर, जवारे अर्पित करके प्रतिमा पर गंगाजल छिडक के प्रतिमा को प्रतीकात्मक रूप से थोड़ा सा हिलाया जाता है, शास्त्रानुसार तो प्रतिमा का विसर्जन यही माना गया है।  निर्माल्य में जो भी होता है ( फूल, पत्र, अगरबत्ती, भस्म आदि ) वह सब का सब जैवअपघटनीय (Biodegradable) होता है , अगर वह हानिकारक या विषाक्त होता तो हम उसे अपने आराध्य की पूजा में उपयोग ही क्यों करते ? उन सब का अपघटन होकर वो कम्पोस्ट में परिवर्तित हो जाएगा जो भूमि की उर्वरा शक्ति को बढायेगा ।



      वर्तमान में कल-कारखाने/बूचड़खाने हमारे पवित्र जलस्त्रोतों को प्रदूषित कर रहे हैं, किसी समय नदियाँ जरुर  गाती होंगी , आजकल तो उनकी बड़ी डरावनी सी आवाज़ सुनाई देती है कातर पुकार जैसी , हाँ, कोई समय रहा होगा जब नदियाँ पंचम स्वर में तान छेड़ती होंगी और हम पिल पड़े उन पर अपनी सारी गंद लेकर उनका सुरीला गला घोंटने को , बेचारी सहम गई फिर नदियाँ सकुचाते-सकुचाते नालियों में और कहीं-कहीं तो नदारदों में शुमार हो गई और हमारी आस्था से जुड़ी चीजों पर प्रश्नचिन्ह लगाये जाते हैं,  लेकिन मेरा मानना है कि  जिस समय बुजुर्गों ने इन प्रक्रियाओं ( निर्माल्य के जल विसर्जन ) का गठन किया था उस समय जनसंख्या इतनी अधिक नहीं थी, कल-कारखाने नहीं थे, रसायनों का प्रयोग नहीं होता था, नदियाँ सतत प्रवाहशील थीं उन पर बाँध आदि नहीं बांधे गए थे ।

      अब अगर हम कुछ सकारात्मक कदम उठायें जैसे कि निर्माल्य आदि को नदियों में विसर्जित करना बंद कर दें तो हम और अधिक मजबूती से सरकार और दूसरे लोगों को इस बात के लिए मजबूर कर सकते हैं कि हमने तो इतना बड़ा कदम उठाया है अब इन औद्योगिक इकाइयों पर भी नकेल कसी जाए कि वो इन विषाक्त अवशिष्ट पदार्थों को जलस्त्रोतों में डालना बंद करें । 


सोमवार, 6 अप्रैल 2015

दुनिया : उल्टी या सीधी ?

मेरे निजस्वरूप आत्मन : 

अपने सिर को उठाते हुए अपनी पीठ की तरफ ले जाने की कोशिश कीजिये, इस स्थिति में आप ऊपर की ओर देखने लगेंगे, कुछ देर में ही आप असहज होने लगेंगे और एक या दो मिनिट में आपको दर्द भी अनुभव होगा ( अगर आप गर्दन, रीढ़, कमर की किसी समस्या से पीड़ित हैं तो कतई ऐंसा ना करें ), अब अपने सिर को सामान्य अवस्था में ले आइये और आगे पढ़िये :-

हम कुछ ही देर में इस अजीबो-गरीब दशा से परेशान हो गये ; जरा कल्पना तो कीजिये किसी ऐंसे शख्स की जिसका सिर पूरा उल्टा घूम के उसकी पीठ से चिपका हो, इसके साथ-साथ शरीर में कई जगह टेढ़ापन हो, हाथ-पैर अक्रिय हों । वो भी कोई थोड़े समय से नहीं पूरे 39 साल से, मैं बात कर रहा हूँ मोंटेसांतो, ब्राज़ील के रहने वाले  ' क्लाउडियो वियेरा डी ओलिवियेरा  ' उर्फ़ 'क्रिस्टो' की , क्लाउडियो का जब जन्म हुआ तो उनके परिजनों को बताया गया कि वो अधिकतम 24 घंटे ही जीवित रहेंगे ।


दरअसल क्लाउडियो 'आर्थ्रोग्रायिपोसिस मल्टीप्लेक्स कोन्जेनाइटा (Arthrogryposis multiplex congenita )' नाम की जन्मजात व्याधि के गंभीर शिकार हैं, इस बीमारी में जोड़ विकृत हो जाते हैं, उनके जोड़ इतने अधिक विकृत हैं कि वह व्हीलचेयर का प्रयोग भी नहीं कर सकते लेकिन इस सब के बावजूद क्लाउडियो ने जिंदगी की चुनौतियों को स्वीकार किया । वो बाकायदा योग्यताधारी लेखापाल हैं । प्रकृति ने उनको जो शरीर दिया है वो उसी के साथ प्रसन्न हैं, वो टी.व्ही देखते हैं, किताबें पढ़ते हैं, मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं, मुँह में पेन दबाकर और जीभ से कम्प्यूटर और इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं ।

जरा सोचिये कि हम, जिनके पास मनुष्य जन्म के रूप में प्रकृति का दिया हुआ अनमोल उपहार है वो इस तोहफ़े की उपेक्षा करने में लगे हुए हैं । क्या हुआ अगर कोई अनचाहा दुःख आ गया तो ? क्या हुआ अगर कुछ मनचाहा नहीं हुआ तो ? इस संसार में ऐंसा कोई नहीं जिसे कोई कष्ट ना हो ! डरते-भागते क्यों हैं ? योद्धा बनकर पूरी ताकत से मुक़ाबला कीजिये, ऐंसी कोई रात नहीं जिसकी सुबह ना हो ।

क्लाउडियो के जिंदगी को जीने के जज़्बे की दुनिया भर में तारीफ़ हो रही है, उनको संस्थानों में प्रेरक वक्ता के रूप में आमंत्रित किया जाता है । क्लाउडियो कहते हैं कि " मेरे लिए यह दुनिया उल्टी नहीं है बल्कि उल्टी दुनिया ही मेरे लिए सीधी है" वो आगे कहते हैं :- " हम सब यहाँ बहुत दिन नहीं रहेंगे लेकिन हमारे पास जितना भी समय है हमें उसका सकारात्मक उपयोग करना चाहिए " , कुछ दिनों पहले ही उन्होंने अपना जन्मदिन मनाया है । प्रिय क्लाउडियो, मैं आपको सैल्यूट करता हूँ , आप दीर्घायु हों और दुनिया को रोशन करते रहें । यह मेरे लिए गर्व की बात है कि मैं आपको फॉलो कर रहा हूँ ।

यह उनकी कुछ तस्वीरें हैं जिनमें से एक में वो स्वयं, एक में प्रेरक व्याख्यान देते हुए, एक में अपनी मित्र के साथ और एक में अपने परिवार के साथ हैं,....


कृपया मेरे प्रणाम स्वीकार करें !


सोमवार, 8 सितंबर 2014

श्री श्रीचैतन्य-चरितावली

तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरि: ॥३॥
( महाप्रभु चैतन्य कृत शिक्षाष्टक से  )


श्रीराधाकृष्ण व चैतन्य महाप्रभु 


भावार्थ : यदि तुम श्रीकृष्णनामसंकीर्तन करना चाहते हो, तो परम यत्न के साथ उसमें अधिकार प्राप्त करो। यह अधिकार प्राप्त करने हेतु अपने जड़ीय अहंकार को छोड़कर अपनेको तृण से भी दीन, हीन और क्षुद्र समझो। वृक्ष के समान सहनशील बनो। वृक्ष के समान क्षमा गुण अपनाओ, प्रतिहिंसा छोड़कर सबका पालन-पोषण करो। अपने जीवन-निर्वाह के लिए किसीको उद्वेग मत दो। अपने सुख का त्याग करके भी परोपकार करो, सब गुणों के आगार होनेपर भी प्रतिष्ठा पाने की लालसा दूर रखो और जीवमात्र में श्रीकृष्ण को स्थित जानकर आदरपूर्वक  उन्हें यथायोग्य सम्मान दो। इस प्रकार दीनता, दया, मान और प्रतिष्ठावर्जन , इन चारों गुणों से विभूषित होकर श्रीकृष्णनामसंकीर्तन करो।

     'श्री श्रीचैतन्य-चरितावली' हाल ही में इस पुस्तक रूपी रत्न को आद्योपांत पढ़ा और मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इसे पढ़ने का जो सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ यह किसी वरदान से कम नहीं है। इसका पाठन करने के बाद इसके बारे में आपको बताने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। पहले श्रीचैतन्य महाप्रभु , जिनकी कि यह जीवनी है उनका अति सूक्ष्म परिचय दे देना मैं आवश्यक समझता हूँ।

आभास :

     श्रीचैतन्य महाप्रभु का जन्म बंगाल के नवद्वीप (नदिया) नामक स्थान में ई. 1485 में हुआ , इनके बचपन का नाम था निमाई, आप विलक्षण प्रतिभाशाली थे, उस समय नवद्वीप विद्या अध्ययन के केंद्र के रूप में प्रसिद्ध था , व्याकरण, मीमांसा, काव्य आदि विषय के यहाँ प्रकांड पंडित थे जो अपनी पाठशालाओं में देश भर से आये छात्रों को इन विषयों की शिक्षा दिया करते थे। उस समय नव्य-न्याय का एक मात्र शिक्षा केंद्र नवद्वीप था। समय आने पर आपने भी विद्याध्ययन किया और नवद्वीप में ही अपनी स्वतंत्र पाठशाला स्थापित की , आपकी पढ़ाने की शैली शीघ्र ही प्रसिद्ध हो गई और आप भी निमाई पंडित के नाम से ना सिर्फ नवद्वीप और बंगाल अपितु अन्य-अन्य जगहों पर प्रसिद्ध हो गये।

     तत्कालीन देशकाल को समझ लेना भी उपयुक्त होगा, उस समय तक भारत के अधिकाँश प्रदेशों में विदेशी ( अफ़गान, मुगल,तुर्क आदि ) राज्यसत्ता कायम हो चुकी थी। छोटे-छोटे अनेक राज्य अस्तित्व में थे जिनमें से कुछ तो बादशाहत के मातहत थे और कुछ स्वतंत्र थे। इन राज्यों का आपस में लगातार युद्ध चलता रहता था जिसकी वजह से आमजनता पीड़ित थी। भौतिक त्रासना के बलवती होने से जनमानस का आध्यात्मिक पतन हो चुका था , संक्षेप में कहें तो अंधकार या चेतनाशून्यता का युग था ।

     ऐंसे समय में विद्वान व ज्ञानीजन भी पुस्तकीय विद्या को ही सब कुछ मानकर अपने दम्भ में चूर रहते थे , उनका विचार था कि ज्ञान प्राप्त करके आजीविका अर्जित करना और जीवन को भौतिक सुखसुविधा मय बनाना ही एकमात्र ध्येय है , जब विद्वानों की यह दशा थी तो सामान्य जनों की कौन कहे ? "भक्तिमार्ग" मानने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता था। स्त्रियाँ, शूद्र,अन्त्यज और निम्न श्रेणी के लोगों को ज्ञान प्राप्त करने या आत्मोन्नति का अनाधिकारी समझा जाता था। ऐंसे कठिन समय में श्रीचैतन्य महाप्रभु का जन्म हुआ । प्रारम्भ में आप भी अपने समकालीन अध्यापकों के समान ही आचरण करते थे , कितुं जगतोद्धार का संकल्प आपके अंतर्मन में सुसुप्त था जो आपकी गया यात्रा के दौरान अंकुरित हुआ । अपने प्रादुर्भाव से श्रीचैतन्य ने धर्म, वर्ण, जाति, लिंग, भाषादि  के भेद-भाव के बिना सभी को एक समान प्रेम-माधुर्य और भगवतभक्ति का उपदेश किया।

पुस्तकपुष्प और लेखक :


श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी व उनकी लिखित श्री श्रीचैतन्य-चरितावली 


     यह ग्रन्थ कागज पर स्याही से मुद्रित जीवनी मात्र ही नहीं है, बल्कि भक्ति और प्रेम के तत्व का साक्षात मूर्तिमान स्वरूप है । इसे पढ़ते हुए ऐंसा लगने लगता है, जैसे कोई आपको बहुत प्यार के साथ इसे सुना कर कानों में रस घोल रहा हो। जगह-जगह विभिन्न शास्त्रों और ग्रन्थों के सन्दर्भ दिए गये हैं। जिनका ना सिर्फ अनुवाद ही साथ में है वरन सरस भावपल्लवन भी किये गए हैं जो बिना कहे ही लेखक के उच्चकोटि के विद्वान् और रस मर्मज्ञ होने की गवाही देते हैं।

     लेखक ने इस ग्रन्थ को लिखने में कमाल की प्रतिभा का परिचय दिया है। संदर्भो के लिए आधे दर्जन से अधिक भाषाओं के पचास से अधिक ग्रन्थों का आश्रय लेने के बाद भी यह पुस्तक एकदम मधुर रसधारावत है जो पढ़ते-पढ़ते ही सीधे मनो-मस्तिष्क में उतरती जाती है। लेखक का हुनर यह नहीं है कि कठिन भाषा और अतिशयोक्तिपूर्ण शब्दालंकार का प्रयोग करके अपनी विद्वत्ता सिद्ध की जाए, ऐंसा करना तो बहुत ही सुगम है क्योंकि इस सबसे अनजान पाठक इतना शब्दाडम्बर देखकर ही लेखक को विद्वान मान लेता है भले ही वह उस पुस्तक से अपने को ना जोड़ पाये, लेकिन श्री श्रीचैतन्य-चरितावली में इतने दुरूह विषय को सामान्य साक्षर भी आत्मसात कर सके यही लक्ष्य नजर आता है, और यही असली लेखकीय प्रतिभा है।

     उक्त ग्रन्थ के लेखक श्रीप्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी हैं । त्यागी व जीवमात्र के कल्याण के आकांक्षी साहित्यकार बहुधा अपनी लिखी पुस्तकों पर अपना चित्र या परिचय प्रकाशित नहीं होने देते, फिर भी इसी पुस्तक व अन्य संदर्भों से जो कुछ जानकारी ( और आपकी छवि भी ) प्राप्त हुई है वह यह है कि आप न सिर्फ संत थे अपितु आप स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी भी थे। आपने स्वतन्त्रता संग्राम में ब्रिटिश राज के विरुद्ध संघर्ष करते हुए जेलयात्रा भी की । इसके बाद आपने गीताप्रेस,गोरखपुर के तत्कालीन व्यवस्थापक श्री हनुमानप्रसाद पोद्दार के इस आग्रह पर कि इस पुस्तक से हिंदीभाषी भी श्रीचैतन्य महाप्रभु के जीवन व शिक्षाओं से परिचित हो सकेंगे, इस पुस्तक का प्रणयन किया। लेखक के ही शब्दों में :

' जिसे अपने जीवन को सर्वोत्कृष्ट , आनंदमय, सौन्दर्यमय, भावमय तथा प्रेममय बनाना हो, जो प्रभु प्रेम में बिलखना, तड़पना, और छटपटाना चाहते हों , उनसे हमारी प्रार्थना है, वे श्री श्रीचैतन्य-चरितावली का स्वाध्याय करें । '

     चलते-चलते आपको बता दें कि मैंने इस पुस्तक के 19वें पुनर्मुद्रण का पाठन किया है। पुस्तक A4 आकार के लगभग 650+ पृष्ठों में मुद्रित है। कपड़े की जिल्द और लेमीनेटेड जैकेट में है। छपाई व कागज़ की गुणवत्ता उत्तम है और मूल्य है रु. 120 ( रु.. एक सौ बीस मात्र ), प्रकाशक हैं गीताप्रेस,गोरखपुर

     बहुत संभव है कि आपको मेरा यह चिठ्ठा बड़ा अस्त-व्यस्त सा लगा हो मुझे यह कहने में कोई द्विविधा नहीं कि यह लेख कोई समीक्षा नहीं है, यह तो इस पुस्तक को लेकर मेरा अनुभव मात्र है, यह तज़ुर्बा गूंगे के गुड़ के समान है जिसका जायका तो मैंने लिया है, लेकिन इसे शब्दों में कह पाना मेरी क्षमता से बाहर है अगर आप भी इस रस-सरोवर में डुबकियाँ लेना चाहते हैं तो एक बार श्री श्रीचैतन्य-चरितावली अवश्य पढ़ें आप सम्मोहित हुए बिना नहीं रह पाएंगे । तब तक के लिए आज्ञा दीजिये , अमित के प्रणाम स्वीकार करें..... 


सोमवार, 1 सितंबर 2014

'इश्क़ तुम्हें हो जाएगा' 'ब्लॉगसेतु' पर : एक किताब - एक पोर्टल

जी हाँ , आज के शीर्षक से आप को कुछ-कुछ आभास तो हो ही गया होगा कि आज चर्चा का विषय है एक किताब और एक अंतर्जाल स्थल , अपनी बात शुरू करते हैं इश्क़ की किताब से फिर आप और हम चलेंगे ब्लॉग के सेतु पर :

 'इश्क़ तुम्हें हो जाएगा' 

हाथ में आई कोई किताब तब तक दिल में नहीं उतर पाती जब तक कि उससे मोहब्बत न हो जाये, लफ्ज़-दर-लफ्ज़ और नज़्म-दर-नज़्म यह सिलसिला पुख्ता होता जाता है, लेकिन जब इस सिलसिले का नाम ही 'इश्क़ तुम्हें हो जाएगा' हो तो यह पहली ही नज़र में, पहली ही छुअन में आँखों से होकर रगों में समाने लगती है ।  इसमें जरुर कहीं ना कहीं कवियित्री की रसायनशास्त्र की तालीम का हाथ है, जो उन्होंने ऐंसे हैरतअंगेज शब्द-समीकरण सिद्ध कर डाले हैं : 

" तुम पर लिखी नज्मों, 
स्याही से रंगे हुए हैं हाथ मेरे, 
तुझसे इश्क़ का सीधा इल्जाम है मुझ पर, 
एक सजा खत्म हो तो नयी कोई नज्म लिखूं ..............."




कलम भी स्याह है, और उसका अंतरद्रव भी स्याह ही है लेकिन जब यह कागज़ के जिस्म पर उतारा गया है तो हम जैसों को सुर्खरूह कर गया है।  और गवाह हैं हम भी इस मौके के जब कि Anulataजी  की कृति ने काव्य-विलयन ( Solution ) बना डाला है , जिसमें इश्क़, विलेय ( solute ) है और इसकी रवानी, विलायक ( Solvent ) आपने हमें यह संतृप्त (saturated) शर्बत चखाया और भरपेट पीने का मौका दिया इसके लिए तहेदिल से शुक्रगुजार हैं | आपकी चीज आपको ही पेश करता हूँ : 

"ठहरे वक्त में चलती रही कलम
इश्क़ और दर्द की रोशनाई से
स्याह हुए पन्ने आपकी नजर
और एक छोटा सा वादा
कि पढ़ना मुझे तन्हाइयों में
इश्क़ तुम्हें हो जायेगा............................

आइये अब कुछ देर पुल पर भी खड़े हो लेते हैं इस पुल का नाम है : 


वो सभी मित्र जो ब्लॉगलेखक हैं,  या ब्लॉगपाठक हैं उनके लिए मित्र Kewal Ram जी और उनकी टीम ने एक नवप्रयास प्रारम्भ किया है, विशेषत: राष्ट्रभाषा हिन्दी के चिट्ठाकारों के लिए  जिसका नाम है Blogsetu, यह है तो एक ब्लॉग एग्रीगेटर लेकिन कुछ हट कर , इसके लिये वह बधाई के पात्र हैं इसकी कुछ विशेषतायें जो मुझे अच्छी लगीं : 




1. इससे जुड़ना पूर्णत: नि:शुल्क और आसान है , पंजीकरण की प्रक्रिया में मुश्किल से 5 मिनिट का समय लगता है। 

2. अपने और साथी ब्लॉगलेखकों के ब्लॉग तक पहुंचना बहुत आसान है , नवीन और पुरानी पोस्ट एक ही जगह पर समयवार ( Chronologically ) उपलब्ध हैं जिनसे आप सुगमता से उनको पढ़ सकते हैं।  

3. प्रतिदिन जुड़ने वाले ब्लॉग की प्रविष्टि रोज अपडेट होती है,  ब्लॉगसेतु से जब कोई ब्लॉग जुड़ जाता है तो उस ब्लॉग पर जब भी कोई पोस्ट ब्लॉगर द्वारा प्रकाशित की जाती है तो वह एक मिनट से भी कम समय में स्वतः ही ब्लॉगसेतु पर अपडेट हो जाती हैंऔर प्रत्येक रविवार को इससे जुड़े हुए ब्लॉग की रैंक अपडेट होती है।  

4. एक बार जुड़ जाने पर आप अपने ब्लॉग के सभी आंकड़े आप यहीं पा सकते हैं जो निश्चय ही ब्लॉगिंग को एक सुखद अनुभव में बदल देते हैं।  

और 5 ( पर अंतिम नहीं ) . साथी ब्लॉगलेखकों का जन्मदिवस प्रदर्शित होता है जो इसे आत्मीयता का एक मंच बना देता है ........

आप भी ब्लॉगसेतु से जरुर जुड़ें , कोई समस्या होने पर नि:संकोच पार केवलराम जी से सम्पर्क कर सकते हैं । 

चलते-चलते कुछ पंक्तियाँ अनुलता जी की किताब से 
जब ज़िंदगी में एहसासे - सुकूँ था
तब लिखी गयी कोई कविता
जब कभी कभी दिल परेशाँ हुआ
तब भी लिख डाली कोई एक सीली - सी नज्म 

तब तक के लिए आज्ञा दीजिये , अमित के प्रणाम स्वीकार करें..... 



बुधवार, 20 अगस्त 2014

वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना

कड़ी धूप में अपने घर से निकलना
वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना  



     अब तो बचपन ही खो गया है , हुमकते कंधे झुक से गये हैं !! “लद्दू घोड़े के जैसे दौड़ना है और सबसे आगे जाना है” हर वक्त बच्चों के कान में यही मन्त्र फूँका जाता है । 

     किसी छुट्टी की सुबह को नाश्ता करके हमजोलियों को साथ लेकर आंगन या छत पर बैठ जाया करते थे | माँ से आटा छानने वाली छन्नी माँगी जाती थी, जो आसानी से नहीं मिलती थी “तुम लोग तोड़ दोगे” , बड़ी मनुहार के बाद जब मिल जाती थी तो उसमें एक सुतली बाँध लेते थे | एक पत्थर या लकड़ी का सहारा देकर उसको टिकाया हुआ है, सुतली सबसे अनुभवी साथी के हाथ में है, छन्नी के नीचे चावल के दाने हैं और बाल-साधना प्रारम्भ !!

     निकर पहने हुए, आस्तीन से नाक पोंछते हुए बैठे हैं , ठंड के दिन हैं तो एक दूसरे की स्वेटर से उन के रुयें उखाड़-उखाड़कर गेंद सी बनायी जा रही है।  कोई गौरैया दिखी नहीं कि सब के सब एक दम चुप ! अब बच्चे गौरैया का और गौरैया बच्चों का जायजा ले रही है ।  बेजुबानों को भी इस बात की समझ होती है कि कौन उन्हें नुक्सान पहुँचायेगा और कौन नहीं, ताड़ जाते हैं वो इस बात को । 

     अब मुंडेर या टहनी से उतर कर गौरैया धीरे-धीरे दानों की तरफ आ रही है और बच्चे अपलक उसकी एक-एक गतिविधि पर नजर रखे हुए हैं, बिलकुल खामोश, मूर्तिवत, पलकें झपकना भूल गए हैं।  अब सारा दारोमदार अनुभवी साथी पर है , डोरी पर कितना तनाव रखना है ? चिड़िया कहाँ आ जाए तब सुतली छोड़ना है, वगैरह-वगैरह !! अब चूँकि सारी जिम्मेदारी उसी की है, चिड़िया पकड़ में ना आई तो दोस्तों के सारे उलाहने उसी को सुनना पड़ेंगे इसलिये वह भी अपने सारे कौशल से काम लेता है ।  

     अब चिड़िया चलनी के बीचोंबीच आ गई है, और इधर सुतली पर पकड़ ढीली करते ही गौरैया गिरफ़्त में ! टोली के बीच में हर्ष की लहर दौड़ गई ..... सभी साथियों ने आकर छन्नी के ऊपर से ही चिड़िया का मुआयना किया कि कहीं यह पहले भी तो नहीं पकड़ी गई थी ? अब यह कैसे मालूम होता था इसका पता अभी चल जाएगा ।  

     चूहे की दौड़ मगरे तक ठीक वैसे ही बच्चों की दौड़ माँ तक, चिड़िया को रंगना है ! रंग कहाँ से आयेगा ? 

     घर में मेहमानी करने के लिए बुआ-मौसी आती ही हैं तो उनको विदा करते वक्त उनके पैरों में गीली हल्दी लगा के महावर-आलता लगाया ही जाता है, बचा हुआ महावर-आलता उसमें सूख जाता है | एक छोटी तश्तरी इसी के लिए है अब की मनुहार इसी तश्तरी के लिए है | माँ दो-चार बातें और पकड़ाएगी फिर यह रंगीन बर्तन दे ही देगी 

     एक बार फिर तजुर्बेकार दोस्त को जिम्मेदारी निभानी है , उसे चिड़िया को पकड़कर बाहर निकालना है , इसे काम में कितनी नाज़ुकी बरतनी पड़ती है , नन्हीं सी तो जान है !! तश्तरी में थोड़ा पानी डाल के रंग तैयार किया गया फिर सबने अपनी-अपनी उँगलियाँ डुबो कर उसे चिड़िया को लगाया.....मस्ती सूझी तो एक दूसरे को भी लगा दिया जब सब मन मुताबिक इस काम को अंजाम दे चुके तो चिड़िया को बिठाकर उसकी सुरक्षा की जा रही है , क्योंकि उसके पंख गीले हैं जब तक सूख न जायेंगे वो उड़ नहीं पायेगी ।  

     और फिर देखते ही देखते गोरैया फुर्रर्रर ...........

     ना किसी को कुछ मिला ना किसी के कुछ हाथ आया पर सब के सब ऐंसे खुश हैं जैसे जग जीत लिया हो ।  यही तो है बचपन ... प्यारे !! तुम किस कोने में जाकर छुप गये ? अमित तुमको बहुत याद करता है 

     चलते-चलते आपको बता दें आज यह रंगी हुई गोरैया देखी छत पर तो यह कहने से अपने आपको रोक नहीं पाया, हमने भी खूब किया है ये खेल कब सुबह, दोपहर से होकर शाम में बदल जाती थी पता भी नहीं चलता था।   तब तक के लिए आज्ञा दीजिये , अमित के प्रणाम स्वीकार करें..... 

शीर्षक : श्री सुदर्शन फाकिर की गजल 'कागज़ की कश्ती' से साभार 
छायाचित्र : अमित  

रविवार, 20 जुलाई 2014

नवजीवन से भेंट

नित नूतन नव जीवन है , हाथ बढा के छू लो ,
बिखरा है आनंद यहाँ , कभी तो खुद को भूलो । 

विनायक” का जन्म एक अद्वितीय घटना है , सृष्टि में यह कोई पहला जन्म नहीं लेकिन हर जन्म के साथ ही कुदरत नाम की “ बड़ी माँ “ का एक और नया जन्म जरूर है , और वो जो बड़ी माँ सबका ध्यान रखती है किसी तिनके को भी अपनी निगाह से ओझल नहीं होने देती उसकी किसी बेटी को चोट न पहुंचे इसका हरदम ख्याल रखती है ।  ममत्व की सरिता , कण-कण को अपने रस में सरोबार कर देती है भावनाओं का अतिरेक, पदार्थ की अवस्था परिवर्तित करने की क्षमता रखता है । 

आज गौ-पालन से जुड़ा हुआ अपना एक अनुभव साझा कर रहा हूँ , गाय को जब प्रसव वेदना होना प्रारम्भ होती है तो वो खाना-पीना लगभग बंद कर देती है और बेचैन हो जाती है , कभी उठती है , कभी बैठती है | इस समय अगर कोई आस-पास हो तो गाय और अधिक परेशान हो जाती है ।  जन्म देने की प्रक्रिया के दौरान सबसे पहले गोवत्स/वत्सा के पैर जननमार्ग से बाहर आते हैं , यह अनुभव इसी से जुड़ा हुआ है । 

नवप्रसूता 'भूरी' और नवजात 'विनायक' 
ध्यान दीजिये प्रकृति या ईश्वर को अपनी एक-एक रचना का कितना ख्याल रहता है, माँ के सुकोमल प्रजनन तन्त्र को कोई चोट न पहुंचे इसलिये नवजात के नन्हें-नन्हें खुरों के नीचे एक सफेद , लगभग 1 से 1.5 से.मी. मोटा, फोम जैसा गुदगुदा आवरण होता है ( जैविक रूप से यह कार्टिलेज है ), धीरे-धीरे हवा के सम्पर्क में आकर यह सख्त होता जाता है , लेकिन अनुभवी गौ-पालक इसको उँगलियों से कुतर कर हटा देते हैं,  जिससे बछड़ा/बछडी को खड़े होने में आसानी हो, इस बीच गाय अपने शिशु को सामान्य से अधिक बल लगाकर चाटती रहती है जिससे नवजात का रक्त-संचार व्यवस्थित हो जाये , यह एक किस्म की मालिश ही है ।  

इस जगह फिर अपने क्षेत्र में प्रचलित एक प्रथा का उल्लेख करना चाहता हूँ , गौ-पालक दुहने के अंदाज़ में गाय के एक थन को पकड़कर दूध की एक धार ( इस धार को हमारे यहाँ ' सेंट' कहते हैं ) धरती पर अर्पित करता है, इसका आशय है नवजन्म पर प्रकृति का अभिनन्दन । 

धीरे-धीरे गिरने-उठने की कोशिश करता हुआ नवजात खड़ा हो जाता है और प्रकृतिदत्त वृत्ति से माँ के अगले-पिछले पैरों के बीच थन ढूँढने की कोशिश करता हुआ अपने प्रयास में सफल हो जाता है और फिर दूध पीने की प्रक्रिया में गोवत्स/वत्सा के मुंह से जो " चुक-चक" जैसी आवाज़ निकलती है संसार का सारा संगीत उसमें एकाकार हो जाता है .....कण-कण विभोर हो जाता है !!

'विनायक' और आपका अपना अमित 
किसी नवीनता का जन्म अपने साथ बहुत से मनोभावों का प्रवाह ले के चलता है और उस समय वैराग्य की पर्वतीय विशालता भी अनुराग की अदृश्य सूक्ष्मता के सामने तुच्छ प्रतीत होने लगती है ।  किसी शांत सी भोर में सुदूर पूर्व से सूरज का आगमन , किसी अंकुर का बीजकोश से अंगडाई लेना, किसी डाल पर अपना वजूद हवाओं में बिखरा देने को आतुर फूल का खिलना और प्रकृति के पालने में किसी नवजीवन का आगमन इन सब में एक समानता है , ये बरबस याद दिलाते हैं कि अभी जीवन में रंग शेष है , संगीत शेष है , सुगंध शेष है , नृत्य शेष है ...........

तब तक के लिए आज्ञा दीजिये , अमित के प्रणाम स्वीकार करें..... 


शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

खामोश लबों से "एक पहर दिनमान शेष है"

   
     पहले-पहल यही कह दूँ कि यह कोई समीक्षा नहीं है, क्योंकि इन कृतियों को लेकर मैं समीक्षात्मक हो ही नहीं सकता और एक बात यह भी है कि मेरी इतनी क्षमता नहीं कि इन पर कोई समालोचना प्रस्तुत कर सकूं । समझ लीजिये कि यह आंतरिक प्रसन्नता है जिसे मैं आप तक पहुँचाने से अपने आप को रोक नहीं पा रहा हूँ ।

पहली किताब है  "एक पहर दिनमान शेष है", यह श्री निर्मल चंद 'निर्मल' जी का  पन्द्रहवां प्रकाशित संग्रह है ।


   
     जब ककहरा भी ठीक से ना आता हो तब से एक कवि के कवितापाठ को सुनना, चाहे उसका एक शब्द भी पल्ले ना पड़ता हो और फिर वयस आ जाने पर यह मालूम होना कि यह भी एक संस्कार था जिसमें तुम्हें दीक्षित किया गया , कुछ इसी प्रकार का अनुभव रहा है मेरा दादाKabi Nirmal Chand Nirmalजी, के साथ. एक शिक्षक , एक कवि होने से पहले वो मेरे लिये परिवार के एक बुजुर्ग हैं। 

     दादा की अशेष ऊर्जा "उठाओ कुदाली" से लेकर "एक पहर दिनमान शेष है" तक अविरल प्रवाहमान है | छंदों से लेकर मुक्तकों तक दादा की कलम संप्रभावी रूप से गतिमान है, दादा के लिये विषयों का कभी कोई बंधन नहीं रहा प्रस्तुत कृति के सन्दर्भ में दादा कहते हैं "जहाँ सृजन हुआ, विसर्जन उसकी नियति है" . किताब से शीर्षक कविता का एक अंश जिसको दादा ने आत्मकथ्य स्वरूप कहा है : 

" तैयारी में क्या ले जाना सोच समझकर आगे बढ़ 
जग से बहुत लड़ा है तूने अपने से भी थोड़ा लड़ 
चेहरे के सब दाग मिटा दे कुंठाओं को तिरोहित कर 
सहज भाव अब धारण कर ले खोटी करनी पर मत अड़ 

एक पहर दिनमान शेष है ढलने की बेला आ गई 
सजधज ले तू साजन के घर चलने की बेला आ गई | "

दूसरी कृति है श्रीमती सौदामिनी वेंकटेश जी की "खामोश लबों से" , 



     
श्रीमती Soudamini Venkateshजी की 'खामोश लबों से' के हाथों में आते ही आत्मीयता के सुखद अहसास से सरोबार हो गया हूँ , शुक्रिया अता करने के लिये अल्फाज़ नहीं मिल रहे हैं | आपका तखल्लुस है "अजनी " , पेश है इसी किताब से आपकी नज़्म का एक भिगो देने वाला हिस्सा :

" हम तुम्हें इतना प्यार करते हैं 
एक महर की गुहार करते हैं 


तेरे दर पे 'अजनी' को जगह जो मिले 
जिन्दगी जीने की वजह ही मिले 
यह दुआ बार बार करते हैं 
एक महर की गुहार करते हैं 
हम तुम्हें इतना प्यार करते हैं "

     मुझे इस आत्मीयता, स्नेह और आशीष से तरबतर कर देने का शुक्रिया, फिर-फिर शुक्रिया आप दोनों ही दीर्घायु हों , शतायु हों और हम सदा आपके स्नेह की छाँव तले रहें, अमित के प्रणाम स्वीकार करें ........