expr:class='"loading" + data:blog.mobileClass'>

बुधवार, 21 मार्च 2018

प्रभु राखें भक्तन की लाज


" चंद लमहे सुकून से, गुज़ार लूं तो चलूँ
ऐ मुहब्बत तुझे दिल से, पुकार लूं तो चलूँ "

अवध की संस्कृति को अपने साहित्यसृजन का केन्द्रीय विषय बनाने वाले "डॉ.योगेश प्रवीन" का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है.


डॉ.साहब की एक पुस्तक है "आपका लखनऊ" इसके नामकरण का राज उन्हीं के शब्दों में :- "जिस सुहानी धूपछाँव का नाम 'लखनऊ' है उसके प्यार का पैगाम आप सबके नाम है, इसलिए लखनऊ पहले हमारा नहीं है हमसे पहले आप का है - "आपका लखनऊ"

अपनी 250 से अधिक पृष्ठों में व्याप्त इस पुस्तक में लखनऊ के इतिहास से लेकर वर्तमान तक को समेटा गया है. क्या कला, क्या हस्तशिल्प, क्या गीत-संगीत, क्या पकवान और क्या तहजीब ; ऐसा कोई लखनवी पहलू नहीं जो इस किताब में समाहित ना हो.



इसी ग्रँथ में " यह आकाशवाणी लखनऊ है" नामक अध्याय भी है जिसमें लेखक ने रेडियो और लखनऊ आकाशवाणी केंद्र की महत्ता को रेखांकित किया है, इस अंदाजे-बयाँ पर गौर कीजियेगा जरा :-

" इस तरह जब लखनऊ आकाशवाणी का जन्म हुआ तो शहीदाने वतन अपने वतन पर निसार हो रहे थे. 02 अप्रैल 1938 की शाम पं. गोबिंदबल्लभ पन्त जी के हाथों लखनऊ रेडियो स्टेशन का उद्घाटन हुआ था और उस समय जो पहला गीत यहाँ से प्रसारित हुआ था, वह था..."प्रभु राखें भक्तन की लाज"

इस पुस्तक के प्रकाशक "लखनऊ महोत्सव पत्रिका समिति, लखनऊ" हैं, पहला संस्करण जो कि मैंने पढ़ा वर्ष 2002 में प्रकाशित हुआ था. लेख के शीर्षक में दिया हुआ कलाम डॉ.योगेश प्रवीन का है.


रविवार, 11 मार्च 2018

हरियाला रेडियो


रंगों के त्यौहार पर कुछ रंगीन होना ही चहिये तो यह हरा-भरा रेडियो ( Tivdio Radio HR 11S )खरीदा है. कुछ छोटी-मोटी बातें इस छोटू-मोटू के बारे में :-

1. यह तीन बैंड ( MW,SW(1-12)और FM) वर्ल्ड रिसीवर रेडियो है, तीनों बैंड की फ्रीक्वेंसी रेंज इस प्रकार है -
*MW - 522 से 1710 Khz
*SW - 3.0 से 23.0 Mhz
*FM - 64.0 से 108 Mhz
DSP चिप होने से सिग्नल पकड़ने की अच्छी गुणवत्ता है. डिजिटल डिस्प्ले है.


2.MP3 प्लेयर ( 32 GBमेमोरी कार्ड सपोर्ट ). ब्लूटूथ है जिससे आप गाने भी सुन सकते हैं और फोन कॉल का जवाब भी दे सकते हैं.
3. ऑटोमैटिक ट्यूनिंग और ऑटोमैटिक / मैन्युअल रेडियो स्टेशन सुरक्षित कर सकते हैं.
4. रेडियो / माइक/ लाइन-इन रिकॉर्डिंग.


निर्माता इसे आपातकालीन रेडियो कहते हैं तो इसके पीछे यह फीचर्स हैं -

5. इसमें रिचार्जेबल बैटरी है जिसे आप मोबाइल चार्जर से या धूप में इसी में लगे हुए सौर सेल से चार्ज कर सकते हैं, थोड़ी सी कसरत करने का मन हो तो हैंड क्रेंक घुमा-घुमा के भी इसे चार्ज किया जा सकता है.
6.बाजू में एक टार्च भी है. संकेत देने के लिए एक लाल संकेतक भी है और एक अलर्ट सायरन भी है.
7. मोबाइल फोन भी रेडियो की बैटरी या सोलर सेल या हैंडक्रेंक से चार्ज किया जा सकता है.
8. घड़ी, कैलेंडर, अलार्म और टाइमर तो खैर हैं ही.
 तब तक हम जरा देखते हैं कि कौन सा स्टेशन अभी क्या प्रसारित कर रहा है !!


शनिवार, 8 जुलाई 2017

// तिरंगा अचार //


"करौंदा गाजर हरीमिर्च की झंकार 

अब है लो आपके चखने को तैयार"


यह मिश्रित अचार है . बरसात के मौसम में इसका तीखा-चटपटा स्वाद खाने के जायके को बढ़ा देता है. सरलता से बनाया जा सकता है और 3-4 माह तक उपभोग किया जा सकता है . इसे बनाने के लिए आपको चाहिए :-

आवश्यक सामग्री :-


1. करौंदा : 250 ग्राम
2. गाजर : 150 ग्राम
3. हरी मिर्च : 100 ग्राम
4. सरसों तेल : 100 ग्राम
5. सरसों (राई) दाल : 30 ग्राम
6.मैथी/ साबुत धनिया / सौंफ / जीरा/ पिसी हल्दी / पिसी लाल मिर्च : प्रत्येक 10 ग्राम
7.कलौंजी/ अजवाइन/कालीमिर्च / लौंग : प्रत्येक 5 ग्राम
8.नमक : 60-65 ग्राम
9. सफेद सिरका : 100 मिलीलीटर
10.हींग :- 1 चुटकी

तैयारी :-

1. करौंदो को बीच में से खड़ा काट कर बीज निकाल दें. गाजर को छील लें. हरीमिर्च के डंठल अलग कर लें.
2. गाजर और हरीमिर्च को समान आकार के टुकड़ों में काट लें और आपस में मिला लें .
3. मैथी/ साबुत धनिया / सौंफ / जीरा को मोटा-दरदरा पीस लें और इसे हींग/ सरसों (राई) दाल, पिसी हल्दी / पिसी लाल मिर्च, कलौंजी/ अजवाइन/कालीमिर्च / लौंग, नमक के साथ मिला कर एक सूखा अचार मसाला तैयार कर लें और एक सूखे-साफ़ बर्तन में अलग रख दें.

विधि :

1. एक गहरी कढ़ाही में सरसों का तेल कड़क गर्म (धुआं देने तक ) करें और आँच से उतार लें.
2.तेल से धुआं निकलना बंद होने पर ( अभी भी तेल मध्यम गर्म रहेगा, इसलिए सावधानीपूर्वक ) इसमें तैयार अचार मसाला अच्छे से मिला दें.
3.अब करौंदे , गाजर और हरीमिर्च को इस मिश्रण में अच्छे से मिला दें.
4. इसे कमरे के तापमान तक ठंडा होने दें.
5. इस मिश्रण में सफेद सिरका मिला दें.
6.आपका तिरंगा अचार तैयार है इसे किसी सूखे व साफ़, ढक्कनबंद बर्तन में भर लें.

विशेष :-
1.करौंदे काटते और बीज निकालते काले ना हों इसलिए इन्हें सादे पानी में डाल कर रखिये
2. बर्तन से अचार निकालते समय हमेशा सूखे व साफ़ चम्मच का प्रयोग करें, कोशिश करें कि अचार के साथ कम से कम तेल आए. ऐसा करने से अचार लम्बे समय तक सुरक्षित रहेगा.
3. अचार तत्काल उपयोग कर सकते हैं फिर भी 3-4 दिन तक अगर इसे गलने दें तो और भी अच्छा स्वाद उभरेगा.
4..आजकल बाजार में तैयार अचार मसाला मिलता है आप उसे भी पैकेट पर दी हुई विधि के अनुसार उपयोग कर सकते हैं. इस स्थिति में आपको लौंग, कलौंजी,अजवायन और कालीमिर्च ही और चाहिए बाकी विधि वही रहेगी.

बनाकर बताइयेगा कैसा लगा :)

© डॉ. अमित कुमार नेमा



मंगलवार, 30 मई 2017

बलात्कार और बलात्कारी ?



गर आप सोचते/सोचती हैं कि पुलिस में दर्ज प्रत्येक बलात्कार का मामला वास्तव में सत्य है तो मुझे आपकी बुद्धि पर तरस आता है.

यहाँ अक्सर कुछ पोस्ट दिखती हैं जिनमें पूछा गया होता है कि " आपके हिसाब से बलात्कारी को क्या सजा मिलनी/दी जानी चाहिए ? " इस प्रश्न के एक से बढ़कर एक उत्तर दिए जाते हैं. कोई कहता है:"लिंग काट दिया जाना चाहिए", कोई "मृत्युदंड दिया जाना चाहिए" तो किसी का कहना होता है "जिंदा खाल खींच ली जानी चाहिए" आदि-आदि.

यक्षप्रश्न यह है कि आप आखिर किसे बलात्कार और बलात्कारी कहेंगे ?
क्या उसे 'जिसके विरुद्ध किसी महिला ने पुलिस में प्राथमिकी दर्ज करा दी हो फिर चाहे वह सच्ची हो या झूठी ?'




" शारीरिक संबंध बनाने की आजादी " आधुनिक स्त्री विमर्श का एक अहम मुद्दा है, इसका आनंद दोनों लेते हैं इसीलिये तो इसे संभोग जैसे अलंकारिक शब्द से विभूषित किया गया है। लेकिन किसी उद्देश्य की पूर्ति ना हो पाने पर या विद्वेषवश पुरुष को झूठे बलात्कार के आरोप में फंसा दिया जाता है !

मान-प्रतिष्ठा क्या मात्र स्त्री की होती है ? ऐसे किसी भी झूठे मामले में फँसे पुरुष का परिवार जो सामाजिक,मानसिक व आर्थिक त्रास झेलता है वह अकथनीय है.

निर्भया ( ईश्वर उसकी आत्मा को शांति प्रदान करें ) कांड के बाद हमारे देश में ऐसे झूठे मुकदमों का सैलाब आया हुआ है. सनद रहे 'दिल्ली महिला आयोग' के अनुसार अप्रैल2013 से जुलाई2014 तक दर्ज ऐसे मामलों में से 53.2% मामले झूठे पाए गये थे.


बुधवार, 24 मई 2017

किरकिचयाऊ


बुंदेली बोली में कहासुनी, तकरार को "किरकिच" कहा जाता है. छायाचित्र में यह जो लाल-नारंगी-पीले फूलों वाली वनस्पति आप देख रहे हैं उसे ही हमारे यहाँ "किरकिचयाऊ" कहते हैं यानि "झगड़ा कराने वाली". कहा जाता है कि इसे जिस घर में डाल दिया जाये उस घर में विवाद हो जाता है.




यह कुछ अतिश्योक्तिपूर्ण कथन है.हालाँकि जिज्ञासावश इसका कारण जानने पर पाया कि इसमें आंशिक सत्यता हो सकती है. जो निष्कर्ष हमने निकाला वह यह है कि यह पौधा पूरा विषाक्त होता है और कुछ यूँ हुआ होगा कि कभी घर में किसी ने इसके फूलों की सुंदरता के कारण सजावट हेतु रखा होगा और किसी बच्चे ने इसे खाने वाली चीज समझ कर खा लिया होगा.बच्चे की तबीयत बिगड़ने का जिम्मेदार इसे लाने वाले को समझकर परिवार के सदस्यों में तू-तू मैं-मैं हो गई होगी ( सम्भवतः जेठानी-देवरानी में ) मतलब कि "किरकिच" हो गई होगी और इस पादप का यह दिलचस्प नामकरण हो गया.


वैसे इसका नाम हिंदी में "कलिहारी", अंग्रेजी में "फायर लिली" , वैज्ञानिक "ग्लोरियोसा सुपर्बा" है. यह एक आयुर्वेदिक औषधि है. खेत की मेड पर लगा हुआ पाया गया.

छायाचित्र: डॉ.अमित कुमार नेमा 








बुधवार, 10 मई 2017

परियों का जन्म




स शाम हवा उदास थी, पत्ता-पत्ता उदास था और वो दोनों भी उदास थे लेकिन आनंद ने जब परी के मुरझाये चेहरे को देखा तो उससे रहा नहीं गया उसे लगा कि अंदर कहीं कोई पैना सा नाखून लगातार खरोंचे जा रहा है इस चुभन को मिटाने उसने कहा :-

" सुनो "
परी ने अपनी भावशून्य नजरें उस पर स्थिर कर दीं
" क्या तुम्हें पता है परियों का जन्म कैसे हुआ ? "


परी की आँखों में अनभिज्ञता और प्रश्न का भाव उभर आया, आनंद ने इशारा समझ लिया

" मैं बताता हूँ "
" जब सूरज की पहली किरण बर्फ से ढके पहाड़ों से टकराई तो वो सात रंगो में बिखर गई हरेक रंग से एक परी बनी, जब नदी पहली बार बही उसकी धारा की हरेक कलकल से एक परी बनी, जब कली पहली बार खिली उसकी खुशबू के हरेक कतरे से एक परी बनी और जब बच्चा पहली बार हंसा तो उसकी किलकारी मोतियों में बदल गई हरेक मोती से एक परी बनी "

परी के होंठों पर एक मुस्कान कौंध के चली गई, आनंद को चुभन कुछ कम सी होती लगी.....

( लिखी जा रही एक कहानी से - © डॉ. अमित कुमार नेमा,  चित्र: साभार - गूगल छवियाँ )





शुक्रवार, 3 जून 2016

इसका नाम प्रेम है


" यह विचित्र है 
इसका नाम प्रेम है

यह सहसा ही उपज
जाता है प्रयासहीन
कोई नहीं जानता हो जाए
कब कहाँ क्यों कैसे किस से


यह विचित्र है
इसका नाम प्रेम है




यह चमत्कारी
बड़ा चतुर सुजान है
एक मुस्कान के बदले
वसूलता अनेक विलाप है

यह विचित्र है
इसका नाम प्रेम है....
."

© डॉ. अमित कुमार नेमा


रविवार, 29 मई 2016

बरेजों की भाजी



भारतीय संस्कृति में 'पान' के महत्व से हम सभी परिचित हैं। मुखवास के रूप में ही नहीं बल्कि इसका महत्व धार्मिक, प्रेम व सम्मान के तौर पर भी है। हमारे बुंदेलखंड में भी देशी पान की एक किस्म जिसे 'बंगला' भी कहा जाता है, बहुत प्रसिद्ध है। हालांकि परम्परागत रूप से इसे उगाने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।

पान का पौधा एक लता ( बेल ) होता है। इसे उगाने के लिए खेतों में घास-फूस से ढँके हुए खास तरह के मंडप ( शेड्स ) बनाये जाते हैं, जिन्हें 'बरेजे' कहा जाता है। जाति या व्यवसाय का परस्पर संबंध चाहे जो भी हो पर पुराने समय में हमारे यहाँ 'चौरसिया/तंबोली' समुदाय के लोगों को शायद इसी कारण 'बरई' कहा जाता था।




पान और बरेजों की चर्चा तो बहुत हुई अब आते हैं अपने विषय पर, यह जो पत्तेदार वनस्पति आप देख रहे हैं यही 'बरेजों की भाजी' है और खास है । यह सामान्य तौर पर खेत में पैदा नहीं की जा सकती लेकिन सिर्फ गर्मियों के मौसम में यह बरेजों में उगती/उगाई जाती है। हमारे यहाँ पास में एक गाँव है जहाँ पान की खेती होती है। वहाँ से रविवार को हमारे कस्बे के हाट बाजार में यह सब्जी बिकने आती है और हाथों-हाथ बिक जाती है।

इस शाक के संबंध में प्रचलित धारणा है कि यह औषधीय गुणों वाली व ठंडी तासीर की होती है, इसलिए गर्मियों में जरुर इसका सेवन करना चाहिए। वैसे इसका स्वाद अच्छा होता है। आप चाहे इसे भाजी के रूप में पकाएं या भजिया (पकौड़े) और भाजीबड़ा बना कर खाएं, वो दूसरी शाकों ( पालक वगैरह ) से ज्यादा स्वादिष्ट लगते हैं।




बुधवार, 18 मई 2016

सबसे बड़ी सौगात है जीवन



परसों म.प्र.मा.शि.मंडल ने कक्षा 10वीं का परीक्षा परिणाम घोषित किया था। आज जैसे ही अखबार की सबसे पहली खबर पर नजर गई तो मन दुःख, क्षोभ और वितृष्णा से भर उठा। यह खबर थी असफल आठ बच्चों ने आत्महत्या की। जिस उम्र में जीवन ठीक से शुरू भी नहीं होता वहाँ इनके जीवन पर पूर्णविराम लग गया। आखिर क्यों मजबूर हुए ये ऐसा कदम उठाने को ?

इसके पीछे कहीं ना कहीं बच्चों के, अभिभावकों, संबंधियों और करीबी लोगों की इनसे की गई अपेक्षाएँ जिम्मेदार हैं। वह बच्चों से चाहते हैं कि वे जो नहीं बन पाए या बन गए बच्चे भी वही बने। इन अपेक्षाओं और इनसे बने दबाव से बालमन में हताशा घर कर जाती है और वो अवसाद से घिर जाते हैं। हमें समझना चाहिए कि हर कोई हर कुछ नहीं बन सकता।




विविधता ईश्वरीय आदेश है। हर बच्चे में किसी ना किसी विषय-क्षेत्र के प्रति नैसर्गिक प्रतिभा होती है। अभिभावकों, संबंधियों और करीबी लोगों को चाहिए वो इसकी सावधानीपूर्वक समीक्षा करें और नौनिहालों को इसमें अपनी प्रतिभा-प्रदर्शन हेतु प्रोत्साहित करें। बच्चे भी पौधों जैसे होते हैं। आप उनकी जरूरत से ज्यादा कांट-छांट करेंगे वो आपके मनमुताबिक तो बन जायेंगे पर अपनी जिजीविषा खो देंगे। उन्हें प्यार-संभाल की धूप-बारिश दीजिये और प्राकृतिक ढंग से विकसित होने दीजिये। वो हरियांगे-लहरायेंगे फूलेंगे-फलेंगे।

साभार गीत  : -  गीतकार : इंदीवर, गायक : मोहम्मद अज़ीज, संगीतकार : राजेश रोशन, चित्रपट : आखिर क्यों (१९८५ ) 



बुधवार, 20 अप्रैल 2016

प्रेम







" प्रेम प्रेम और प्रेम 
इस परिभाषा के इर्दगिर्द
कितनी बातें कहीं गईं
ना जाने कितनी सुनी गईं


विच्छेदन जाने हुए कितने
और इस एक प्रेम में 
रक्त अस्थि मज्जा स्नायु 
नाड़ी तंत्र पाये कितने

प्रयोगों के निष्कर्ष लिखे गये
प्रेम शोध के नये बिंदु गढ़े गये
पर यह कभी ना बदल सका 
लाख जतन बदलने किये गये

सुनो प्रेम चुप हो जाता है 
यह बस सुनता है 
कहता नहीं बताता नहीं कोई नेम 
प्रेम प्रेम और प्रेम "

© डॉ. अमित कुमार नेमा

चित्र  साभार :  गूगल  छवियाँ  

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

// वर्णान्धता ( Colour blindness ) //


मोटे तौर पर 'वर्णान्धता' से आशय एक ऐसी अक्षमता से है जब व्यक्ति रंगों को देख नहीं पाता या रंगों के बीच अंतर नहीं कर पाता है। इसके बहुत से कारण हैं और यह कई प्रकार की होती है।

साथ में दिए गये चित्र को देखें तो इस एक ही चित्र में सामान्य व्यक्ति को '74' लिखा हुआ दिखेगा; जबकि एक किस्म की वर्णान्धता से ग्रसित व्यक्ति को इसमें '21' और एक अन्य तरह की वर्णान्धता से ग्रसित व्यक्ति को इसमें कोई भी अंक नहीं दिखेगा। अलग-अलग प्रकार की वर्णान्धता की पुष्टि हेतु जापान के 'प्रो.इशीहारा' ने इस तरह के कई प्रारूपचित्र विकसित किये हैं।

सेना, यातायात सहित बहुत से क्षेत्रों में रंगों का बहुत महत्व है इसलिए वर्णान्ध व्यक्ति को इन क्षेत्रों के कामों के लिए अनुपयुक्त माना जाता है।

यह तो हुई शारीरिक वर्णान्धता की बात लेकिन हमारे समाज में एक मानसिक वर्णान्धता भी पाई जाती है। एक ही जैसे विचार या परिस्थितियों को लेकर जब हमारा पक्ष हो तो रंग हमें कुछ और दिख पड़ते हैं और दूसरे का हो तो कुछ और....


सोमवार, 21 मार्च 2016

कविता का जन्म

विता का जन्म निश्चय ही करुणा से हुआ है | किसी घटना से जब मानव मन के अंतरतम स्तर पर स्पर्श होता है तो काव्य प्रकट हो जाता है | इस विश्व का प्रथम पौरुषेय काव्य ग्रन्थ महर्षि वाल्मीकि की रामायण को कहा जाता है | महर्षि वाल्मीकि को इसी लिए आदिकवि भी कहा जाता है |

रामायण में ही उल्लेखित है कि एक बार जब आदिकवि स्नान के लिये वन प्रान्त में गये तो वहाँ की सुषमा को निरखते हुए उन्होंने एक वृक्ष पर प्रणयातुर क्रौंच ( सारस ) युगल को देखा, काम के वशीभूत होकर वह खग-दम्पत्ति प्रेमालाप में मग्न था, तभी बहेलिये के चलाये एक तीर ने क्रौंच को वेध डाला, ह्त्प्राण पक्षी धराशायी हो गया |



अभी उस दम्पत्ति का प्रेमगान पूर्ण भी नहीं हो पाया था,  अभी वह दोनों अपने पंखो को पसारे अपने आनन्द नृत्य में उन्मत्त ही थे और प्रियतमा का जीवन-आधार रक्त से लथपथ, छटपटाता हुआ काल के गाल में समा जाने को उत्सुक भूमि पर तड़प रहा था | क्रौंची भीषण आर्तनाद कर उठी, काल की यह निष्ठुर लीला देखकर, खग-पत्नी का यह प्रस्तर प्रगालक करुण विलाप सुनकर और इस पाप पूरित हिंसा कर्म का वीक्षण कर महामुनि शोकाकुल हो गए, उनका हृदय भर आया और अकस्मात उनके मुंह से यह श्राप निकल पड़ा :- 

मा निषाद प्रतिष्ठाम त्वमगम: शाश्वती: समा:
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम | ’

( अर्थ : रे व्याध ! कामपीड़ित क्रौंच के जोड़े में से तूने एक को मारा, अतएव अब तू संसार में बहुत दिन न रहेगा | अर्थात तेरा शीघ्र नाश हो )

जगत् का यह पहला श्लोक था, श्रापरूपी यह वचन छंदोंबद्ध था, विश्व में इसके पूर्व वाणी छंदोंबद्ध न थी | इस प्रकार पृथ्वी में काव्य का जन्म हुआ जिसकी जननी करूणा थी, है और रहेगी |

चलते-चलते आपको बताना चाहूँगा कि आज 'विश्व कविता दिवस ' है ; यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) ने प्रति वर्ष 21 मार्च को कवियों और कविता की सृजनात्मक महिमा को सम्मान देने के लिए यह दिवस मनाने का निर्णय किया। यूनेस्को ने 21 मार्च को विश्व कविता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा वर्ष 1999 में की थी। विश्व कविता दिवस के अवसर पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और साहित्य अकादमी की ओर से सबद-विश्व कविता उत्सव का आयोजन किया जाता है।



शनिवार, 19 मार्च 2016

जाल




क्या कभी फँसते देखा है 
मकड़ी को अपने ही जाल में 
उसने खुद बुना है इसे 
फँसने का डर नहीं उसे


उसे पता है 
कहाँ से निकलना है 
किधर पहुँचना है 
किसे कब कैसे फँसाना है

और जकड़ के 
अपना जहर भर के 
जीते-जी है पचा देना 
उत्कटता चूस लेना

जिस दिन तुम जाल से 
बचना सीख लोगे
उस दिन तुम जाल भी 
बुनना सीख लोगे

खुद ही मकड़ी बन जाओगे

शब्द : डॉ.अमित कुमार नेमा
छायाचित्र  : नेशनल ज्योग्राफिक 






बुधवार, 2 मार्च 2016

जीवन परीक्षा



ह बात लगभग 6-7 वर्ष पूर्व की है. हमारा स्वैच्छिक संगठन मध्यप्रदेश शासन द्वारा ऑनलाइन प्रदत्त की जाने वाली सेवाओं को जनता तक पहुँचाने का सुविधा केंद्र चलाता है. ऐसे में एक ग्रामीण आदिवासी छात्रा ने हमारे यहाँ से कक्षा 12 में स्वाध्यायी छात्र के रूप में परीक्षा में सम्मिलित होने का आवेदन किया.

आवेदन करने के करीब 3 माह बाद ( जबकि परीक्षायें शुरू होने वाली थी ) यह छात्रा हमारे सुविधा केंद्र पर आई और उसने बताया कि आज उसकी प्रायोगिक परीक्षा है लेकिन उसका प्रवेश पत्र ना होने के कारण उसे परीक्षा में शामिल नहीं होने दिया जा रहा है. यह बात जब मुझे बताई गई तब मैंने सभी आवश्यक कागजों के साथ संकुल केन्द्राध्यक्ष को पत्र लिखकर उक्त छात्रा को परीक्षा में उपस्थित होने देने का निवेदन किया लेकिन केन्द्राध्यक्ष ने ना तो रोलकॉल होने और ना ही प्रवेशपत्र होने से ऐसा करने में अपनी असमर्थता जताई.


इस भागदौड़ में शाम हो गई और वह बालिका प्रायोगिक परीक्षा में शामिल नहीं हो सकी, शाम को जब वह मुझसे मिलने पहुँची तो संयोगवश मेरी जगह उसकी भेंट हमारी माँ से हो गई और उसने यह सारा घटनाक्रम माँ को सुनाया ( स्वाभाविक है कि बताते हुए वह रोने लगी ), माँ ने यह सब सुनकर उसे सांत्वना दी, खाना खिलाया और कहा कि धीरज रखो कोई ना कोई रास्ता जरुर निकलेगा.



रात में जब माँ ने मुझे यह बताया तो मैंने अगले दिन के पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम स्थगित करके इस बारे में कुछ करने की ठानी. अगले दिन कार्यालयीन समय शुरू होते ही मैंने माध्यमिक शिक्षा मंडल (म.प्र.) भोपाल को फोन लगाना शुरू किया और सचिव महोदया से बात करवाने की अपील की. कई बार फोन लगाने के बाद दोपहर बाद 3-4 बजे के लगभग मेरी उनसे बात हो सकी और मैंने उन्हें इस की जानकारी दी. उन्होंने सकारात्मक रूख अपनाते हुए मुझे आश्वासन दिया कि "आज रात तक सारे प्रवेशपत्र मंडल की वेबसाइट पर अपलोड कर दिए जायेंगे और डाउनलोड किये हुए प्रवेशपत्र की मान्यता भी मूल के बराबर ही रहेगी " तब मैंने उनसे कहा कि " लेकिन जो छात्र/छात्रा इनके अभाव में प्रायोगिक परीक्षाओं से वंचित हो गये हैं, उन्हें तो संबंधित विषय में पूरक (supplementary) आ जायेगी" इस बात पर गौर करते हुए उन्होंने पुन: निर्णय लेते हुए कहा कि " प्रवेशपत्र ना होने के कारण जिनके साथ ऐसा हुआ है, बिना पूरक दिए हुए उनकी प्रायोगिक परीक्षायें दोबारा आयोजित करवा दी जायेंगी" यह सुनकर मुझे असीम संतोष हुआ.

इसके बाद मैंने उक्त छात्रा का प्रवेशपत्र डाउनलोड करवा कर अपने एक सहायक के हाथों उसके दूरस्थ घर तक पहुँचाया और उसे यह जानकारी दी कि वह यह सोचकर मन छोटा ना करे कि वो प्रैक्टिकल परीक्षा में फेल हो जायेगी, अपने पहले पेपर के दिन वह आकर माँ और मुझसे मिली भी. दो या तीन दिन बाद मुझे मंडल से फोन आया और जिससे पता चला कि यह समस्या सारे प्रांत में बहुत सी जगहों पर थी और मेरे द्वारा समय रहते सूचना देने के कारण हल हो गई.

हर साल जब भी बोर्ड परीक्षायें शुरू होती हैं तो यह वाक्या बरबस याद आ जाता है.


छवि साभार : दैनिक ट्रिब्यून  



सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

नशे में कौन नहीं है मुझे बताओ जरा


खिर नशे का इतना आकर्षण क्यों है? हर सरकार लगातार नशीले और मादक पदार्थ महँगे कर देती है; बावजूद इसके इनकी बिक्री में कोई कमी नहीं आती, बल्कि बढ़त ही होती है,जबकि नशा एक सामाजिक बुराई है।

नशे का इतना आकर्षण है ही इसीलिये क्योंकि नशा, व्यक्ति को उसकी वास्तविक जिन्दगी से दूर ले जाता है। काल्पनिक ही सही पर उस दुनिया में ले जाता है जहाँ सबकुछ उसके मुताबिक़ होगा। यह अधिकार वह अपने असली जीवन में नहीं पाता, अत: इसे प्राप्त करने को या महज ख्याली जीने को ही वह इसका सहारा लेता है, ( यह जानते होने के बाद भी कि नशा घातक है) फिर वो नशा चाहे शराब का हो, पैसे का हो या ज्ञान ही का क्यों ना हो !



दूध की दुकान किसी निर्जन स्थान में हो , दुकानदार भूखा मर जाएगा लेकिन दारु की दुकान काले कोस भी हो तो ग्राहक शिद्दत से जाएगा ! अगर हम इससे अधिक बड़े आकर्षण मानवीय जीवन में साकार कर लें तो नशा फिर ठहर नहीं सकता पर यह मात्र एक परिकल्पित (Hypothetical) बात है।

सभी सरकारें और व्यापारी इस बात को अच्छे से जानते हैं। इसलिए इन्हें महँगा करके अपनी जेबें भरते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि आदमी के गम और अरमान इतने हैं कि चाहे इनके दाम कितने भी बढ़ा दो मुनाफ़ा कम होने वाला नहीं है।

चित्र साभार : गूगल छवियाँ





गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

समय तुम




" भी टिक-टिक करती सुई 
सुन के भी अनसुनी कर दी 
कभी घड़ी पर हाथ रख दिया 
तो कभी काँटा ही थाम लिया


समय तुम मेरे वश में नहीं 
तुम्हें रोकने का पर हर 
जतन कर लिया 
कहीं तो ठहर जाओ 
कि अपना रूखा-सूखा सब कुछ 
हमने तुम्हारे नाम कर दिया

कभी घड़ी पर हाथ रख दिया 
तो कभी काँटा ही थाम लिया....."

© डॉ. अमित कुमार नेमा

रविवार, 17 जनवरी 2016

// फालाफेल , ताहिनी सॉस के साथ //


थोड़ा ट्विस्ट मार के

1. फालाफेल
( 4 लोगों के लिए )

( क ) आवश्यक सामग्री :- ( चित्र में क्र. 1 )

1. काबुली चने : 300 ग्राम
2. प्याज : 2 मध्यम ( लगभग 200 ग्राम )
3. लहसुन : 2 छोटे चम्मच ( लगभग 10 ग्राम )
4. अदरक : 2 छोटे चम्मच ( लगभग 10 ग्राम )
5. हरीमिर्च : 2 छोटे चम्मच ( लगभग 10 ग्राम )
6. हरी धनिया : 2 छोटे चम्मच ( लगभग 10 ग्राम )
7. धनिया/मिर्ची/हल्दी/गर्ममसाला ( सभी पावडर में ) : प्रत्येक एक छोटा चम्मच ( लगभग 5-5 ग्राम )
8. अजवायन : एक छोटा चम्मच ( लगभग 5 ग्राम )
9. नमक : स्वादानुसार
10. तेल ( आपकी पसंद का ) : तलने के लिए पर्याप्त

( ख ) तैयारी :-

1. काबुली चने को 5-6 घंटे के लिए लगभग तीन गुने पानी में भिगो दें. ( ठंड के दिनों में गर्म पानी का उपयोग अच्छे परिणाम देगा )
2. प्याज, लहसुन, अदरक, हरी धनिया और हरीमिर्च को बारीक-बारीक काट लें .

( ग ) विधि :-

1. अच्छी तरह से फूले हुए चनों को मिक्सर में बिना पानी का इस्तेमाल किये महीन-दरदरा पीस लें. ( इसे पेस्ट नहीं बनाना है, कितना पीसना है इसके लिए चित्र 1 का इनसेट
देखें )
2. शेष सारी सामग्री इस चने की पीठी में अच्छे से मिला दें.
3. इस मिश्रण को टिक्की के रूप में मनचाहा आकार दें.
4. इन टिक्कियों को मध्यम-तेज आँच पर सुनहरा होने तक तल लें.
5. फालाफेल तैयार हैं .

2. ताहिनी

( क ) आवश्यक सामग्री :- ( चित्र में क्र. 2 )

1. सफेद तिल : 100 ग्राम
2. खाद्य तेल : 3/4 कप ( लगभग 125 मि.ली.)
3. सेंधा नमक : स्वादानुसार

( ऊपर के तीनों घटक ताहिनी में आवश्यक रूप से इस्तेमाल किये जाते हैं, लेकिन मैंने इसमें कुछ अतिरिक्त सामग्री मिला के इसे अपना ट्विस्ट दिया है )

4. अदरक : 1 छोटा चम्मच ( लगभग 5 ग्राम )
5. हरीमिर्च : 1 छोटा चम्मच ( लगभग 5 ग्राम )
6. लहसुन : 1 छोटा चम्मच ( लगभग 5 ग्राम )
7. सूखी लाल मिर्च : 2 नग ( लगभग 5 ग्राम )
8. जीरा : 1 छोटा चम्मच
9. लौंग : 5 नग
10 . कालीमिर्च : 10-15 नग
11. काले जैतून : 5-7 नग

( ख ) तैयारी :-

1. सफेद तिल, सूखी लाल मिर्च, जीरा, लौंग, कालीमिर्च को बहुत धीमी आंच पर 2 से 3 मिनिट भूनकर ठंडा कर लें.
2. लहसुन, अदरक, हरी धनिया और हरीमिर्च को बारीक-बारीक काट लें .
3. जैतून के गोलाकार टुकड़े कर लें.

( ग ) विधि :-

1. सारी सामग्री ( जैतून के टुकड़े छोड़कर ) को ब्लेंडर में डाल कर एक दम महीन पावडर बनने तक पीसें.
2. अब इसमें तेल मिलाते हुए इसे अपने मनचाहे गाढ़ेपन तक पीसें. ( मैंने इसे सॉस और चटनी दोनों रूपों में बनाया )
3. तैयार मिश्रण में जैतून के टुकड़े मिला दें . ( तैयार ताहिनी के लिए चित्र 2 का इनसेट देखें )
4. ताहिनी तैयार है.

3. परोसना :-

1. गर्मागर्म फालाफेल को ताहिनी और अपनी मनचाही सजावट के साथ परोसें . ( चित्र 3 )

4. विशेष :-

* प्याज, लहसुन, अदरक ना खातें हों तो इनके बिना ही इसी विधि से बनाएं.
* फालाफेल बनाने के लिए काबुली चने के अलावा मोठ, राजमा, लोबिया या दूसरी फलियों या इनके मिश्रण का उपयोग किया जा सकता.
* ताहिनी में खट्टापन चाहें तो निम्बू के रस या सिरके का उपयोग कर सकते हैं.
* फालाफेल को ताहिनी के अलावा भी दही, टमाटर कैचप या अपनी मनपसंद चटनी के साथ खा सकते हैं.




बुधवार, 30 दिसंबर 2015

उसी नमक के सहारे





" ह जीवन सबको मिलता है
एक पारी के रूप में
अपना खेल दिखाने को
सब पर छा जाने को 
कुछ बेहतर खेल दिखाते हैं
सब उन पर मोहित हो जाते हैं
क्योंकि वो भावों के सेवक नहीं 
उनका हर करतब एक सिद्ध प्रमेय
लिखे जाते प्रशस्ति काव्य उन्हीं के
संवेदी होना , सहनशील होना 
है इस पारी को खोना
पर कभी भीगे सीले पृष्ठ
भी पढ़े जायेंगे पढ़ते हुए
आंसुओं से भिगोये जायेंगे
मैं उसी नमक के सहारे जी रहा हूँ ! "


© डॉ. अमित कुमार नेमा


मंगलवार, 10 नवंबर 2015

ग्राम्य नायक



जब भी सोशल मीडिया  पर   आते हैं तो पाते हैं कि 90% पोस्ट्स; राजनीति, टी.व्ही. चैनलों और उनके विख्यात या कुख्यात पत्रकारों के बारे में होती हैं। आपको बताना चाहेंगे कि हम यह सब देखते ही नहीं, क्यों नहीं देखते ? इसका एक ठोस कारण है।

क्योंकि इन सब को किसी नैतिक जिम्मेदारी का बोध नहीं है, यह मात्र व मात्र आपको भावनात्मक रूप से उद्वेलित करके अपनी टकसालें चला रहे हैं; समसामयिक घटनाक्रम को जानने हेतु अखबारों का सहारा है। यह तरीका भले ही पुराना हो पर कारआमद है। तो फिर हम देखते क्या हैं ?

हम देखते हैं "जयवंत उर्फ़ दादा वाडेकर " जैसे लोगों के बारे में, दादा ने अपना जीवन समर्पित किया है सीमांत कृषकों द्वारा हाथों से इस्तेमाल किये जाने वाले छोटे-छोटे से खेतिहर औजारों को कुशल बनाने में, नये औजारों के गढ़ने में; शायद आपको मेरी बात समझ ना आई हो तो एक उदाहरण से समझाता हूँ :-





'खेत में फसल की कटाई करने वाले हंसिये का वजन लगभग 250 ग्रा. होता है, कटाई के दौरान लगातार इसे चलाने पर मजदूरों ( विशेषत: महिला मजदूरों ) के हाथ भर आते हैं (मांसपेशियों का थकाव), दादा ने इसका उन्नत प्रारूप बनाया है जिसका वजन पारम्पारिक हंसिये की तुलना में आधा (लगभग 120 ग्रा.) गम्भीरता पूर्वक सोचा जाए तो यह ना कुछ सा लगने वाली बात एक बड़ी सोच का परिणाम है।'

यह और इन जैसे लोग किसी इतिहास में दर्ज नहीं किये जायेंगे। इनके बारे में कोई किताब या जीवनी नहीं लिखी जायेगी , इनकी अपनी कोई राजनैतिक विचारधारा नहीं, इनकी कोई आर्थिक महत्वाकांक्षा नहीं; पर यह अपने समाज को, परिवेश को वह लौटा रहे हैं जिसकी पूर्ति किसी परिकल्पित राजनैतिक-आर्थिक सिद्धांत से संभव नहीं और अपने समुदाय में उत्सव मनाने की असली वजह इन्हीं जैसे लोग हैं।


शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

नित्य मिलन-विरह





" भंगुर है वह मिलन 
जिसे तुम  स्थायी मान बैठी हो
इसलिये नहीं कि मेरे प्रेम में 
कोई खोट है पर प्रयास है
तुमसे हर बीते दिन से 
अधिक प्रेम करने का 
इसके लिए जरूरी है कि
यह मिलन अस्थायी हो
मैं तुम्हें नित-नित खोना चाहता हूँ 
मैं तुम्हें नित-नित पाना चाहता हूँ "

© डॉ. अमित कुमार नेमा