expr:class='"loading" + data:blog.mobileClass'>

गुरुवार, 27 मार्च 2014

बिखरता समाज और वेद - 1

ब्लॉग के आलेखों को पढने की सुविधा हेतु उनको विषयवार टेब्स ( Tabs) में व्यवस्थित किया गया है प्रकाशित  सभी चिट्ठों को आप  'मुखपृष्ठ : शुभ स्वागतमके अतिरिक्त उनके  टेब्स ( Tabs) पर भी क्लिक करके विषयवार पढ़ सकते हैं । उदाहरण : यथा आप इस लेख और इस विषय ( धर्मआध्यात्म ) पर आधारित लेखों को "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा टेब्स ( Tabs)  में भी  पढ़ सकते हैं धन्यवाद ) 

     एक सुंदर मनोहर सुबह के समय गर्म चाय की प्याली के साथ-साथ एक समाचारपत्र भी मिल जाये तो उससे बेहतर कुछ नहीं है , किन्तु इन समाचारपत्रों में हम क्या पढ़ते हैं, लालसा, भ्रष्टाचार, अन्याय, बलात्कार, डकैती या और ऐंसे ही अनेक विषयों पर खबरें ।  इनको पढकर हमें अपनी सुरक्षा और संरक्षा की चिंता होने लगती है | हमारे समाज को यह क्या हो रहा है ? लोग अपनी चेतना की हत्या करके पैसे के पीछे क्यों भाग रहे हैं ? हमारे समाज में मूल्य धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं ।  कुछ लोग अनैतिक माध्यमों से संपत्ति का संचय तथा ताकत प्राप्त कर रहे हैं । 

समाज का विकृतिकरण 


     हम सभी ने समान मूल्यों को ग्रहण किया है, इसके बावजूद हम में से कुछ ऐंसे हैं जो सफलता के फटाफट रास्ते के रूप में अन्याय  तथा अनैतिकता के मार्ग पर चल रहे हैं ।  मूल्य वे विचार तथा अवधारणाएं हैं जिन्हें हम विशेष गुणों के रूप में धारण करते हैं और इन्हें हम बचपन से ही सीखते हैं ।  इन मूल्यों को हम अपने माता-पिता तथा अपने आस-पास के वातावरण से ग्रहण करते हैं जबकि नैतिकता वह युक्ति है जिससे हम इन मूल्यों की जाँच करते हैं । 

     भारत को हमेशा से ही उच्च आचरण तथा नैतिक मूल्यों वाला राष्ट्र माना गया है | क्या हमारा समाज, देश तथा स्वयम हम में होने वाला परिवर्तन हमारी इस विचारधारा में परिवर्तन कर रहा है ? क्या हम उच्च मूल्यों की अपनी व्यवस्था को खो रहे हैं या यह मात्र वह चरण है जिससे हमारा देश गुजर रहा है ।  आखिर हम अपने समाज में क्यों ऐंसा होने दे रहे हैं ? इस संक्रमण काल ने कुछ ज्वलंत समस्याओं को जन्म दिया है, यथा  : - 

*  परिवारों का विखण्डन

* कानून और व्यवस्था की कमी
 
* अपराध और भ्रष्टाचार 

* मदिरापान और बढती हुई नशाखोरी
 
* महिलाओं, बच्चों तथा समाज के अन्य संवेदनशील सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार 

* संसाधनों का अन्यायपूर्ण प्रयोग व बर्बादी 

* जीवन को हानि तथा जनसंपत्ति को क्षति, और इन्हीं के समान अन्य बहुत ही समस्याएँ जो आज हमारे समाज को विभिन्न स्तरों पर कुप्रभावित कर रही हैं । इन सभी समस्याओं के सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक व राजनैतिक सहित अनेकानेक पहलू हैं । 

     प्राचीन समय से ही भारतीय प्रज्ञा ने एक  सकारात्मक दृष्टिकोण वाले समतामूलक समाज के निर्माण पर जोर दिया है ।   भारतीय ऋषियों-मनीषियों ने व्यक्तिगत शुचिता पर बल दिया है, हम सब यह बात जानते हैं अथवा किसी न किसी रूप में स्वीकार करते हैं कि  मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है ।   मानव,  समाज की ईकाई होता है जब एकक अच्छा होगा तभी हम समूह के अच्छा होने की बात कर सकते हैं ।  समाज को सुस्थिर एवं सम्पुष्ट बनाने के लिए यह आवश्यक है कि सभी व्यक्ति परस्पर प्रेम भाव से रहें ।  यह भाव तभी उत्पन्न हो सकता है जब मानव समाज में समता मूलक भावना का जन्म हो, समानता का विचार ही प्रेम व मित्रता की नींव है ।  भारतीय संस्कृति के आधारभूत माने गये  " वेदों " तथा उनके अभिन्न अंग " उपनिषदों "  में इस प्रकार के उपदेश दिए गए हैं कि मनुष्य को मित्रता की भावना बढ़ाने के लिए परस्पर किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए ।  स्नेह व मैत्री तब उत्पन्न होता है जब हम एक दूसरे के सुख-दुःख को अनुभव कर सकें ।  इस समत्व  पर देखिये किस प्रकार प्रकाश डाला गया है :

वैदिक वांग्मय अंश (पांडुलिपि )


                                               समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। 
                                           समानमस्तु वो मनोः यथा वः सुसहासति।। ( ऋग्वेद 10.191.4 )
 व्याख्या : यहां यह संदेश दिया गया है कि तुम सब का एक जैसा संकल्प हो, एक जैसा निश्चय हो। तुम सब के हृदय एक जैसे हों। तुम सब का मन एक जैसा हो जिससे तुम आसानी से संगठित हो सको। मैत्री भाव तभी बढ़ सकता है जब सब का मन एक जैसा हो। एक दूसरे के सुख दुख का अनुभव कर सकें। तभी हम आपस में बंधुभाव  को बढ़ा सकते हैं।
      जैसा कि हमने पूर्व में जाना कि मूल्य वे विचार व धारणाएँ हैं जिन्हें हम विशेष रूप से धारित करते हैं और एक कठिन परिस्थिति में हम जिस प्रकार व्यवहार करते हैं उनसे ही हमारे मूल्यों की पहचान होती है ।  यह धारणाएँ एक व्यक्ति अपने परिवार से ही सीखता है, इसलिये जीवन में आदर्श व सकारात्मक मूल्यों की पैदाइश के लिये आवश्यक है कि परिवार में एक सौहार्दपूर्ण वातावरण हो , हमारी संस्कृति में परिवार का सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है और नि:संदेह पारिवारिक वातावरण किसी के जीवन विकास में एक अहम कारक है, इसलिये मैत्रीभाव सबसे पहले परिवार में ही होना चाहिये : 
                                            
                                               अनुव्रत: पितु पुत्रो मात्रा भवतु संमना : । 
                                               जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शन्तिवाम ॥ 

                                               मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन् मा स्वसारमुत स्वसा। 
                                               सम्यन्च: सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया।। ( अथर्व. 3.30.2-3 )
व्याख्या : पुत्र अपने पिता के अनुकूल कर्म करने वाला हो और अपनी माता के साथ समान विचार से रहने वाला हो पत्नी अपने पति से मधुरता तथा सुख से युक्त वाणी बोले ( 2 ), भाई अपने भाई से विद्वेष न करें और बहिन अपनी बहिन से विद्वेष न करें, वे सब एक विचार वाले तथा एक कर्म वाले होकर परस्पर कल्याणकारी वार्तालाप करें | ( 3 )  
     मैत्री  भाव पहले परिवार में होना चाहिए। परिवार के लोग परस्पर प्रेम से रहें, बड़े छोटों पर स्नेह रखें और छोटे बड़ों का आदर करें। भाई-भाई परस्पर प्रेम से रहें। एक भाई दूसरे भाई से द्वेष न करे। बहनें भी परस्पर प्रेम से रहें वे भी परस्पर द्वेष न करें। बहनें विवाह के पश्चात् अलग परिवारों में अलग-अलग स्थानों पर चली जाती हैं। उनकी पारिवारिक, आर्थिक और सामाजिक स्थिति अलग-अलग अच्छी, सामान्य या दुर्बल हो जाती है। बहनों को एक दूसरे से द्वेष न कर परस्पर प्रेम रखना चाहिए और आवश्यकता के अनुसार एक दूसरे की सहायता करनी चाहिए। सभी का मत एक समान हो। परिवार में सभी का मत सदा एक समान नहीं होता। 
सब को अपना मत प्रकट करने का अधिकार है परंतु अन्त में जो मत ठीक हो वह सभी को मानना चाहिए। अब कौन सा मत ठीक है इसका निर्णय परिवार के मुखिया या बड़े लोगों द्वारा किया जाता है और परिवार के अन्य लोगों का यह कर्तव्य  हो जाता है कि उस मत को स्वीकार कर उसका पालन करें। परिवार में ‘‘एक ने कही दूसरे ने मानी’’ की भावना से कार्य करने पर पारिवारिक सौमनस्य तथा मैत्री भाव बना रहता है और परिवार में सुख-समृद्धि  की बढ़ोतरी होती है। 

     परिवार के सभी लोग जब एक मत वाले हो जाएंगे तो वे सारे समान संकल्प वाले होकर एक जैसा ही कार्य करेंगे। सभी समान कार्य करेंगे अर्थात् परिवार का कोई भी सदस्य ऐसा कोई भी कार्य न करे जो दूसरे के कार्य के विपरीत हो या परिवार के दूसरे सदस्यों को हानि पहुंचाने वाला हो।  परिवार में एक दूसरे को अच्छी लगने वाली बातें बोलना बहुत हितकारी होता है। इसलिए वेद का आदेश है कि परिवार के सारे सदस्य-भाई बहन कल्याणकारी-हितकारी और अच्छी लगने वाली वाणी बोलें। वस्तुतः संसार के सभी लोग तो भाई बहन ही हैं सबके साथ ही उत्तम और हितकारी वाणी ही बोलनी चाहिए।

     चलते चलते आपको बता दें ,  भारतीय चिन्तन का ग्रन्थ रूप सबसे पहले वेदों में मिलता है। ऋग्वेद  विश्व का सबसे पहला ग्रंथ है। वेद, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक और उपनिषद्,  यह वैदिक साहित्य हैं। वेद चार हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।  ऋग्वेद में इन्द्र, अग्नि, विष्णु, मित्रा और वरुण जैसे देवताओं की स्तुतियाँ हैं, और कई दार्शनिक तथा सामाजिक चिन्तन हैं। यजुर्वेद में यज्ञ करने तथा अन्य यज्ञ संबंधी विषयों पर विचार है। सामवेद गायन विद्या का आधार  है। ऋग्वेद की ऋचाओं को साम के रूप में सामवेद में प्रस्तुत किया गया है। अथर्ववेद में सामाजिक, राजनैतिक, रोगनिवारक आदि विविध् मन्त्र हैं। 

     जब पाती लिखने का विचार किया था तो सम्पूर्ण विषय वस्तु को एक ही बार में प्रस्तुत करने का विचार था , किन्तु विषय सम-सामयिक समस्याओं के प्राचीन समाधान पर होने के कारण ग्राह्यता को ध्यान में रखते हुये अब एकाधिक खंडों में प्रस्तुत करूंगा | तब तक के लिये आज्ञा दीजिये , सादर प्रणाम...........  
            



7 टिप्‍पणियां:

  1. एक अच्छा और सार्थक लेखन जिसके लिए आपको न ही धन्यवाद और न आभार-साभार। सीधा हार्दिक नमन भारतीय संस्कृति,लोकाचार और जीवन पद्धति का समिश्रण तो है ही आपका आलेख।।।।साथ ही लोगों में परस्पर बढती वैमनस्यता के द्वारा आपने लोगों के साधन और साध्य की पवित्रता की अनदेखी करने की तरफ भी ध्यान आकर्षित किया है। फिर उपाय भी बताये है की कैसे समन्वय से मधुर सम्बन्ध स्थापित किये जा सकते है ।कुल मिलाके एक संतुलित आलेख जिसमे मानव जीवन की विशिष्टताओं और उससे जुरे हर पहलू पर संक्षिप्त मगर सटीक व्याख्या की गयी है,मानों गागर में सागर।।
    बाकी एक शिकायत है की अभी तक आपने यात्रा वृतांत पूरा नहीं सुनाया है।।। हम आपकी व्यस्तता और मजबूरी समझ सकते है। पर भविष्य में उम्मीद करेंगे की आप इसे अवश्य प्रकाशित करेंगे।।।।
    आपका स्नेहिल स्वप्निल

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक अच्छा और सार्थक लेखन जिसके लिए आपको न ही धन्यवाद और न आभार-साभार। सीधा हार्दिक नमन भारतीय संस्कृति,लोकाचार और जीवन पद्धति का समिश्रण तो है ही आपका आलेख।।।।साथ ही लोगों में परस्पर बढती वैमनस्यता के द्वारा आपने लोगों के साधन और साध्य की पवित्रता की अनदेखी करने की तरफ भी ध्यान आकर्षित किया है। फिर उपाय भी बताये है की कैसे समन्वय से मधुर सम्बन्ध स्थापित किये जा सकते है ।कुल मिलाके एक संतुलित आलेख जिसमे मानव जीवन की विशिष्टताओं और उससे जुरे हर पहलू पर संक्षिप्त मगर सटीक व्याख्या की गयी है,मानों गागर में सागर।।
    बाकी एक शिकायत है की अभी तक आपने यात्रा वृतांत पूरा नहीं सुनाया है।।। हम आपकी व्यस्तता और मजबूरी समझ सकते है। पर भविष्य में उम्मीद करेंगे की आप इसे अवश्य प्रकाशित करेंगे।।।।
    आपका स्नेहिल स्वप्निल

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रिय स्वप्निल , आपकी प्रतिक्रिया सदैव मेरे उत्साहवर्धन में सहायक रही है | अभी यह आलेख का पहला भाग है , अगले भाग में इसी विषय को निरंतर करूंगा | हाँ, आपने सही कहा काफी समय से यात्रा श्रंखला का कोई नवीन आलेख प्रकाशित नहीं कर पाया हूँ , मेरी नजर है इस बात पर भी , किन्तु शीघ्र ही आपकी यह शिकायत दूर करने की कोशिश की जायेगी | मेरे हार्दिक धन्यवाद कृपया स्वीकार करें |

    उत्तर देंहटाएं
  4. उत्तर
    1. प्रिय जीत पंडित जी , आपने मेरा आलेख पढ़ा और यह आपको अच्छा लगा , आपका आभारी हूँ . शीघ्र ही इसका शेष भाग प्रस्तुत करूंगा , आपका संरक्षण अपेक्षित है |

      हटाएं
  5. बहुत ही सुंदर और ज्ञानवर्धक लेख, साधुवाद!
    समाज मे व्याप्त बुराईयां, दिन-प्रतिदिन होती घटनाएं, निश्चित ही भारत जैसे महान आध्यात्मिक राष्ट्र के लिए चिंता की बात है! इसको बढ़ाने मे हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति भी कम दोषी नही है! हमारे यहाँ शिक्षा के बारे मे कहा जाता था-सा विद्या या विमुक्तये, जिसे बदलकर आज सा विद्या या नियुक्तये कर दिया गया,छात्रों को बचपन से ही आज धन को सर्वोपरी रखने और भोगवादी बनने की शिक्षा मिल रही! हमे इनको रोकना होगा और इन बुराइयों से हमे मुक्ति आध्यात्म के राह पर चलकर तथा वेदों, उपनिषदों को अपने जीवन मे उतारकर ही मिलेगी!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. स्नेहिल रामरत्न जी , साधूवाद, आपकी सटीक प्रतिक्रिया में जिन कारणों का उल्लेख किया गया है नि:संदेह वह भी समस्याओं के मूल में व्याप्त हैं | मैंने प्रयास किया है सम-सामयिक समस्याओं का समाधान खोजने के लिए अपनी जड़ों की ओर लौटने का , जब समाज समरस होगा तभी वास्तविक अर्थों में इसके अस्तित्व का बोध होगा | पुनश्च धन्यवाद !!

      हटाएं