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बुधवार, 24 मई 2017

किरकिचयाऊ


बुंदेली बोली में कहासुनी, तकरार को "किरकिच" कहा जाता है. छायाचित्र में यह जो लाल-नारंगी-पीले फूलों वाली वनस्पति आप देख रहे हैं उसे ही हमारे यहाँ "किरकिचयाऊ" कहते हैं यानि "झगड़ा कराने वाली". कहा जाता है कि इसे जिस घर में डाल दिया जाये उस घर में विवाद हो जाता है.




यह कुछ अतिश्योक्तिपूर्ण कथन है.हालाँकि जिज्ञासावश इसका कारण जानने पर पाया कि इसमें आंशिक सत्यता हो सकती है. जो निष्कर्ष हमने निकाला वह यह है कि यह पौधा पूरा विषाक्त होता है और कुछ यूँ हुआ होगा कि कभी घर में किसी ने इसके फूलों की सुंदरता के कारण सजावट हेतु रखा होगा और किसी बच्चे ने इसे खाने वाली चीज समझ कर खा लिया होगा.बच्चे की तबीयत बिगड़ने का जिम्मेदार इसे लाने वाले को समझकर परिवार के सदस्यों में तू-तू मैं-मैं हो गई होगी ( सम्भवतः जेठानी-देवरानी में ) मतलब कि "किरकिच" हो गई होगी और इस पादप का यह दिलचस्प नामकरण हो गया.


वैसे इसका नाम हिंदी में "कलिहारी", अंग्रेजी में "फायर लिली" , वैज्ञानिक "ग्लोरियोसा सुपर्बा" है. यह एक आयुर्वेदिक औषधि है. खेत की मेड पर लगा हुआ पाया गया.

छायाचित्र: डॉ.अमित कुमार नेमा 








बुधवार, 10 मई 2017

परियों का जन्म




स शाम हवा उदास थी, पत्ता-पत्ता उदास था और वो दोनों भी उदास थे लेकिन आनंद ने जब परी के मुरझाये चेहरे को देखा तो उससे रहा नहीं गया उसे लगा कि अंदर कहीं कोई पैना सा नाखून लगातार खरोंचे जा रहा है इस चुभन को मिटाने उसने कहा :-

" सुनो "
परी ने अपनी भावशून्य नजरें उस पर स्थिर कर दीं
" क्या तुम्हें पता है परियों का जन्म कैसे हुआ ? "


परी की आँखों में अनभिज्ञता और प्रश्न का भाव उभर आया, आनंद ने इशारा समझ लिया

" मैं बताता हूँ "
" जब सूरज की पहली किरण बर्फ से ढके पहाड़ों से टकराई तो वो सात रंगो में बिखर गई हरेक रंग से एक परी बनी, जब नदी पहली बार बही उसकी धारा की हरेक कलकल से एक परी बनी, जब कली पहली बार खिली उसकी खुशबू के हरेक कतरे से एक परी बनी और जब बच्चा पहली बार हंसा तो उसकी किलकारी मोतियों में बदल गई हरेक मोती से एक परी बनी "

परी के होंठों पर एक मुस्कान कौंध के चली गई, आनंद को चुभन कुछ कम सी होती लगी.....

( लिखी जा रही एक कहानी से - © डॉ. अमित कुमार नेमा,  चित्र: साभार - गूगल छवियाँ )





शुक्रवार, 3 जून 2016

इसका नाम प्रेम है


" यह विचित्र है 
इसका नाम प्रेम है

यह सहसा ही उपज
जाता है प्रयासहीन
कोई नहीं जानता हो जाए
कब कहाँ क्यों कैसे किस से


यह विचित्र है
इसका नाम प्रेम है




यह चमत्कारी
बड़ा चतुर सुजान है
एक मुस्कान के बदले
वसूलता अनेक विलाप है

यह विचित्र है
इसका नाम प्रेम है....
."

© डॉ. अमित कुमार नेमा


रविवार, 29 मई 2016

बरेजों की भाजी



भारतीय संस्कृति में 'पान' के महत्व से हम सभी परिचित हैं। मुखवास के रूप में ही नहीं बल्कि इसका महत्व धार्मिक, प्रेम व सम्मान के तौर पर भी है। हमारे बुंदेलखंड में भी देशी पान की एक किस्म जिसे 'बंगला' भी कहा जाता है, बहुत प्रसिद्ध है। हालांकि परम्परागत रूप से इसे उगाने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।

पान का पौधा एक लता ( बेल ) होता है। इसे उगाने के लिए खेतों में घास-फूस से ढँके हुए खास तरह के मंडप ( शेड्स ) बनाये जाते हैं, जिन्हें 'बरेजे' कहा जाता है। जाति या व्यवसाय का परस्पर संबंध चाहे जो भी हो पर पुराने समय में हमारे यहाँ 'चौरसिया/तंबोली' समुदाय के लोगों को शायद इसी कारण 'बरई' कहा जाता था।




पान और बरेजों की चर्चा तो बहुत हुई अब आते हैं अपने विषय पर, यह जो पत्तेदार वनस्पति आप देख रहे हैं यही 'बरेजों की भाजी' है और खास है । यह सामान्य तौर पर खेत में पैदा नहीं की जा सकती लेकिन सिर्फ गर्मियों के मौसम में यह बरेजों में उगती/उगाई जाती है। हमारे यहाँ पास में एक गाँव है जहाँ पान की खेती होती है। वहाँ से रविवार को हमारे कस्बे के हाट बाजार में यह सब्जी बिकने आती है और हाथों-हाथ बिक जाती है।

इस शाक के संबंध में प्रचलित धारणा है कि यह औषधीय गुणों वाली व ठंडी तासीर की होती है, इसलिए गर्मियों में जरुर इसका सेवन करना चाहिए। वैसे इसका स्वाद अच्छा होता है। आप चाहे इसे भाजी के रूप में पकाएं या भजिया (पकौड़े) और भाजीबड़ा बना कर खाएं, वो दूसरी शाकों ( पालक वगैरह ) से ज्यादा स्वादिष्ट लगते हैं।




बुधवार, 18 मई 2016

सबसे बड़ी सौगात है जीवन



परसों म.प्र.मा.शि.मंडल ने कक्षा 10वीं का परीक्षा परिणाम घोषित किया था। आज जैसे ही अखबार की सबसे पहली खबर पर नजर गई तो मन दुःख, क्षोभ और वितृष्णा से भर उठा। यह खबर थी असफल आठ बच्चों ने आत्महत्या की। जिस उम्र में जीवन ठीक से शुरू भी नहीं होता वहाँ इनके जीवन पर पूर्णविराम लग गया। आखिर क्यों मजबूर हुए ये ऐसा कदम उठाने को ?

इसके पीछे कहीं ना कहीं बच्चों के, अभिभावकों, संबंधियों और करीबी लोगों की इनसे की गई अपेक्षाएँ जिम्मेदार हैं। वह बच्चों से चाहते हैं कि वे जो नहीं बन पाए या बन गए बच्चे भी वही बने। इन अपेक्षाओं और इनसे बने दबाव से बालमन में हताशा घर कर जाती है और वो अवसाद से घिर जाते हैं। हमें समझना चाहिए कि हर कोई हर कुछ नहीं बन सकता।




विविधता ईश्वरीय आदेश है। हर बच्चे में किसी ना किसी विषय-क्षेत्र के प्रति नैसर्गिक प्रतिभा होती है। अभिभावकों, संबंधियों और करीबी लोगों को चाहिए वो इसकी सावधानीपूर्वक समीक्षा करें और नौनिहालों को इसमें अपनी प्रतिभा-प्रदर्शन हेतु प्रोत्साहित करें। बच्चे भी पौधों जैसे होते हैं। आप उनकी जरूरत से ज्यादा कांट-छांट करेंगे वो आपके मनमुताबिक तो बन जायेंगे पर अपनी जिजीविषा खो देंगे। उन्हें प्यार-संभाल की धूप-बारिश दीजिये और प्राकृतिक ढंग से विकसित होने दीजिये। वो हरियांगे-लहरायेंगे फूलेंगे-फलेंगे।

साभार गीत  : -  गीतकार : इंदीवर, गायक : मोहम्मद अज़ीज, संगीतकार : राजेश रोशन, चित्रपट : आखिर क्यों (१९८५ ) 



बुधवार, 20 अप्रैल 2016

प्रेम







" प्रेम प्रेम और प्रेम 
इस परिभाषा के इर्दगिर्द
कितनी बातें कहीं गईं
ना जाने कितनी सुनी गईं


विच्छेदन जाने हुए कितने
और इस एक प्रेम में 
रक्त अस्थि मज्जा स्नायु 
नाड़ी तंत्र पाये कितने

प्रयोगों के निष्कर्ष लिखे गये
प्रेम शोध के नये बिंदु गढ़े गये
पर यह कभी ना बदल सका 
लाख जतन बदलने किये गये

सुनो प्रेम चुप हो जाता है 
यह बस सुनता है 
कहता नहीं बताता नहीं कोई नेम 
प्रेम प्रेम और प्रेम "

© डॉ. अमित कुमार नेमा

चित्र  साभार :  गूगल  छवियाँ  

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

// वर्णान्धता ( Colour blindness ) //


मोटे तौर पर 'वर्णान्धता' से आशय एक ऐसी अक्षमता से है जब व्यक्ति रंगों को देख नहीं पाता या रंगों के बीच अंतर नहीं कर पाता है। इसके बहुत से कारण हैं और यह कई प्रकार की होती है।

साथ में दिए गये चित्र को देखें तो इस एक ही चित्र में सामान्य व्यक्ति को '74' लिखा हुआ दिखेगा; जबकि एक किस्म की वर्णान्धता से ग्रसित व्यक्ति को इसमें '21' और एक अन्य तरह की वर्णान्धता से ग्रसित व्यक्ति को इसमें कोई भी अंक नहीं दिखेगा। अलग-अलग प्रकार की वर्णान्धता की पुष्टि हेतु जापान के 'प्रो.इशीहारा' ने इस तरह के कई प्रारूपचित्र विकसित किये हैं।

सेना, यातायात सहित बहुत से क्षेत्रों में रंगों का बहुत महत्व है इसलिए वर्णान्ध व्यक्ति को इन क्षेत्रों के कामों के लिए अनुपयुक्त माना जाता है।

यह तो हुई शारीरिक वर्णान्धता की बात लेकिन हमारे समाज में एक मानसिक वर्णान्धता भी पाई जाती है। एक ही जैसे विचार या परिस्थितियों को लेकर जब हमारा पक्ष हो तो रंग हमें कुछ और दिख पड़ते हैं और दूसरे का हो तो कुछ और....