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सोमवार, 3 नवंबर 2014

सम्पूर्ण व्यक्तित्व का पोषण - 3


व्यक्तित्व मात्र बाह्य उपस्थिति नहीं है। इसमें संपूर्ण अस्तित्व जिसमें जीवन के भौतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक भाग सम्मिलित हैं। एक व्यक्ति को सच्चे आत्म या प्रकृति, शुद्ध चेतना या आत्मा के रूप में माना जाता है। आत्मा, जीवन की दिव्य आभा है, तैत्तिरीयोपनिषद के अनुसार यह पांच आवरणों के साथ मानव शरीर में रहती है। इन आवरणों को कोश कहा जाता है। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय पांच कोश हैं। 
चित्र: पंचकोश 

हमने अभी तक इनमें से तीन के बारे में जाना अब हम विज्ञानमय कोश और आत्मा के सबसे निकट के आनन्दमय कोश के बारे में चर्चा करेंगे। हम जानते हैं कि अन्न और प्राणमयकोश का पूर्ण संबंध और मनोमय कोश का आंशिक संबंध हमारी देह से है , किन्तु विज्ञानमय कोश इससे पूर्णत: मुक्त है और जब पहले के तीन कोश सुविकसित हो जाते हैं तब विज्ञानमय कोश का प्रभाव क्षेत्र प्रारम्भ होता है , आइये जानते हैं कैसा है यह कोश :

४. विज्ञानमय कोश  (The Intellectual sheath )
 सुबुद्धि ही मानवीय सदगुणों के विकास को उत्प्रेरित करती है , यह सुबुद्धि ही विज्ञान है :
मंत्र :  तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः । तस्य श्रद्धैव शिरः । ऋतं दक्षिणः पक्षः । सत्यमुत्तरः पक्षः । योग आत्मा । महः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ तै. २.४.२॥
अर्थ : निश्चय ही पहले बताये हुए मनोमय आत्मा से भिन्न किन्तु उसके अंदर रहने वाला विज्ञानमय आत्मा है, जो पुरुष की आकृति का है  ( हम उसका स्वरूप समझ सकें इसलिए सरलता से समझाने की दृष्टि से इसकी तुलना प्राणी के रूप में की गई है ) श्रद्धा इसका सिर है, सदाचार इसका दायाँ हाथ है, सत्य भाषण इसका बाँया हाथ है, योग ( ध्यान द्वारा परमात्मा में एकाग्रता ) इसका मध्य (धड़ ) भाग है और परमात्मा ही इसकी पूँछ या आधार भाग है , आगामी श्लोक भी इसी के संबंध में है । 

अब आगे इस की महिमा बताते हैं :   
मंत्र : विज्ञानं यज्ञं तनुते । कर्माणि तनुतेऽपि च । विज्ञानं देवाः सर्वे । ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते । विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद । तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति । शरीरे पाप्मनो हित्वा । सर्वान्कामान्समश्नुत इति । तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य ॥ तै. २.५.१॥
अर्थ : विज्ञान,  यज्ञों ( अच्छे कार्यों  ) का विस्तार करता है और कर्मों का भी विस्तार करता है, यह सब इन्द्रियरूपी देवता सबसे श्रेष्ठ ब्रह्म के रूप में विज्ञान की ही सेवा करते हैं | यदि कोई इस बात को जानता है और बिना आलस इस विज्ञानमय ब्रह्म का चिंतन-मनन करता है तो शरीर से उत्पन्न पापों ( अभिमान ) को शरीर में ही त्याग कर समस्त फलों को प्राप्त करता है , वही पूर्ववर्ती परमात्मा यहाँ भी है जो अन्नरसमय स्थूलशरीरधारी कोश , प्राणमयकोश और मनोमयकोश में विद्यमान ( समान स्वरूपवान ) है | 

व्यक्तित्व से संबंध : मनज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से बाहरी उद्दीपनों को प्राप्त करता है और अनुक्रियाओं को  कर्मेन्द्रियां को प्रेषित  करता है। यद्यपि पाँच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त उद्दीपन अलग और एक दूसरे  से भिन्न होते हैं किन्तु उनका एकीकृत अनुभव मन के द्वारा लाया जाता है। बुद्धि,  विभेदीकरण एवं विवेकीकरण की प्रक्रिया है, जो  प्राप्त उद्दीपनों  की जाँच करके  निर्णय लेती  है। यह मन को भी उन अनुक्रियाओं  के बारे में  सूचित करती है, जिन्हें  क्रियान्वित किया जाना है। स्मृति के आधार पर मन, सुखद या दुःखद छाप को बुद्धि से जोड़ता है। बुद्धि अपनी चिन्तन की क्षमता के साथ एक तर्कसंगत निर्णय लेती है जो मन को पसन्द नहीं भी हो सकता है, लेकिन अंततः व्यक्ति के  लिए लाभप्रद होता  है। मन सभी यादों  और ज्ञान का भंडार-गृह है। अनुभव का यह भण्डार-गृह, व्यक्ति के कार्यां का मार्गदर्शक कारक है। मन को संवेगों के केन्द्रस्थल के  रूप में वर्णित किया जा सकता है और बुद्धि उन क्षेत्रों  की जाचं करती है जिसमें वे कार्य करते हैं । मन की पहुँच केवल  ज्ञात जगत तक है लेकिन  बुद्धि अज्ञात स्थानों में जाकर उसकी जाँच कर सकती है, मनन कर सकती है और नई खोजों को पूरी  तरह समझ सकती है।

प्रत्येक कोश अपने पूर्ववर्ती कोश को नियंत्रित करता है और सभी का परस्पर समानुपातिक संबंध है

५. आनन्दमय कोश (The Blissful Sheath)
हम सभी आनन्द से ही उत्पन्न हुए हैं, इस कारण आनन्द को प्रेम करते हैं, उसे खोजते हैं लेकिन न जानने के कारण प्राप्त नहीं कर पाते :
मंत्र : तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयात् । अन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम्। अन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ तै. २.५.२॥
अर्थ : निश्चय ही पहले बताये हुए विज्ञानमय आत्मा से भिन्न किन्तु उसके अंदर रहने वाला आनन्दमय आत्मा है, जो पुरुष की आकृति का है । प्रियता ही इसका सिर है,  मोद इसका दायाँ हाथ है, प्रमोद इसका बाँया हाथ है, आनन्द  इसका मध्य (धड़ ) भाग है और ब्रह्म ही इसकी पूँछ या आधार भाग है , आगामी श्लोक भी इसी के संबंध में है । 

व्यक्तित्व से संबंध :  यह पाँचों कोशों में अंतरतम है और इसमें मनोकामनाएं होती हैं। वे उसी तरह अवचेतन में स्थित होती हैं, जिस तरह से गहरी नींद की स्थिति में  होते हुए भी हमारा अस्तित्व रहता है। हम जागृत और स्वप्न किसी भी स्थिति में हों  एक बार वहाँ पहुँच कर उस जाग्रत और स्वप्न की स्थिति के  उत्पातों के अनुभवों  के लोप के  कारण हम सब अपेक्षाकृत एक ही अबाधित शांति और आनंद का अनुभव करते हैं, इसलिए यह आनन्दमय माना जाता है । आनन्दमय कोश, विज्ञानमय कोश का नियन्त्रण करता है क्योंकि बुद्धि, मनो-अभिलाषाओं के नियन्त्रण और देखरेख में कार्य करती है। जब अन्य सभी कोश अच्छी तरह से विकसित हो जाते हैं तब हम आन्तरिक और बाह्य जगत के बीच सद्भाव का अनुभव करते हैं । यह सद्भाव हमें प्रसन्नता और आनन्द की अनुभूति देता है। पाँचों कोश एक व्यक्ति द्वार पहने  कपड़ों  की पर्तों  की तरह हैं  जो पूरी तरह से पहनने वाले से भिन्न हैं वैसे ही आत्मा पाँचों  बाहरी पर्तों से  भिन्न और अलग है।

इन कोशों का नियमित विकास अभ्यास द्वारा किया जा सकता है  :

कोशों का विकास

व्यक्तित्व का विकास अन्नमय कोश से  शुद्ध चेतना की ओर धीरे  इसके आवरण रूपी कोशों को हटाकर होता है। खाने  की नियमित आदतों,  सही प्रकार का भोजन , व्यायाम और खेल-कूद, टहलना, घूमना  और योगासन  से  अन्नमयकोश के  विकास में  सुविधा होती है। प्राणायाम और सांस लेने के अभ्यास से प्राणमय कोश की गुणवत्ता में  सुधार होता है। मनोमयकोश के विकास के लिए अच्छे साहित्य, कविता, उपन्यास, निबंध और लेख का अध्ययन उपयोगी होता है। सभी गतिविधियाँ जो किसी की बुद्धि को चुनौती दें  विज्ञानमय कोश का विकास करती हैं । इन गतिविधियों में बहस करना, समस्या सुलझाना , अध्ययन की तकनीक, छोटे अनुसन्धान , परियोजनाओं, मूल्यांकन  और पुस्तकों  की सराहना व प्रख्यात व्यक्तियों के  साक्षात्कार शामिल हैं। यह सब गतिविधियाँ आपके अपने लघुरूप से परे जाने और आपका अपने साथी प्राणियों, अपने समुदाय-समाज के सदस्यो अपने देश और पूरे विश्व के साथ तादातम्य स्थापित करने का अवसर देती हैं,  यह आनन्दमय कोश के विकास को सुविधापूर्ण बनाता है। यहाँ तक कि अपने चिन्तन में  आप अपनी चेतना का विस्तार करने के लिए पृथ्वी, सूर्य, तारे,   आकाशगंगाओं और ब्रह्माण्ड तक पहुँच सकते हैं। इस तरह हम धीरे-धीरे वैयक्तिक आत्म या वैयक्तिक चेतना और सार्वभौमिक आत्म या सार्वभौमिक चेतना के बीच संबंध बनाते हैं।


इस पाती के साथ ही पिछले दो लेखों से चली आ रही इस चर्चा का समापन करता हूँ । यह आलेख इसी श्रंखला के पहले के दो आलेखों की अपेक्षा कुछ बड़ा हो गया है,  विश्वास है कि मनोविज्ञान के सन्दर्भ में यह सामग्री आपको रुचिकर प्रतीत हुई होगी  हमेशा की तरह मुझे आपके अमूल्य सुझावों की बहुत जरूरत है , उम्मीद है आप मुझे इनसे नवाजेंगे । अब अपने  अमित को आज्ञा दीजिये, मैं आपके हृदय में विराजमान उस परमसत्ता को सादर प्रणाम करता हूँ कृपया स्वीकार करें ......


2 टिप्‍पणियां:

  1. संतुलित जीवनशैली को अपनाने को प्रेरित करते विचार, अर्थपूर्ण एवं सहेजने योग्य जानकारी

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  2. आपने इस प्रस्तुति को पढ़ा और सराहा , आभारी हूँ !!

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